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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

७०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| अतोऽस्मादन्यान्यपि यानि वीर्यवन्ति कर्माणि प्रयत्नाधिक्यनिर्वर्त्यानि--यथाग्नेर्मन्थनम्, आजेर्मर्यादायाः सरणं धावनम्, दृढस्य धनुष आयमनमाकर्षणम्-अप्राणन्नपानंस्तानि करोति ।<br><br>अतो विशिष्टो व्यानः प्राणादिवृत्तिभ्यः । विशिष्टस्योपासनं ज्यायः फलवत्त्वाद्राजोपासनवत् । एतस्य हेतोरेतस्मात्कारणाद्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत, नान्यद्वृत्त्यन्तरम् । कर्मवीर्यवत्तरत्वं फलम् ॥ ५ ॥ | इसके सिवा जो दूसरे भी अधिक प्रयत्नसे निष्पन्न होनेवाले वीर्ययुक्त कर्म हैं—जैसे अग्निका मन्थन, किसी सीमातक दौड़ना और सुदृढ़ धनुषको खींचना—उन्हें भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करते हुए ही करता है ।<br><br>अतः प्राणादिवृत्तियोंकी अपेक्षा व्यान विशिष्ट है; और राजाकी उपासनाके समान फलवती होनेके कारण विशिष्टकी उपासना भी उत्कृष्टतर है । इस हेतुसे अर्थात् इस कारणसे व्यानरूपसे ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये—वायुकी अन्य वृत्तियोंके रूपसे नहीं । कर्मको अधिक प्रबल बनाना ही उसका फल है ॥ ५ ॥ |


उद्गीथाक्षरोंमें प्राणादिदृष्टि

अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदँसर्वँ स्थितम् ॥ ६ ॥

इसके पश्चात् उद्गीथाक्षरोंकी—‘उद्गीथ’ उस नामके अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये—‘उद्गीथ’ इस शब्दमें प्राण ही ‘उत्’ है, क्योंकि प्राणसे ही उठता है; वाणी ही ‘गी’ है, क्योंकि वाणीको ‘गिरा’ कहते हैं तथा अन्न ही ‘थ’ है; क्योंकि अन्नमें ही यह सब स्थित है ॥ ६ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथाधुना खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत भक्त्यक्षराणि मा भूवन्नित्यतो विशिनष्टि—उद्गीथ इति, उद्गीथनामाक्षराणीत्यर्थः। नामाक्षरोपासनेऽपि नामवत एवोपासनं कृतं भवेदमुकमिश्रा इति यद्वत्।<br><br>प्राण एव उत्, उदित्यस्मिन्नक्षरे प्राणदृष्टिः। कथं प्राणस्योच्चमित्याह—प्राणेन ह्युत्तिष्ठति सर्वोऽप्राणस्यावसाददर्शनात्; अतोऽस्त्युदः प्राणस्य च सामान्यम्। वाग्गीः, वाचो ह गिर इत्याचक्षते शिष्टाः। तथान्नं थम्, अन्ने हीदं सर्वस्थितमतोऽस्त्यन्नस्य थाक्षरस्य च सामान्यम् ॥ ६ ॥इसके पश्चात् अब उद्गीथके अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये। 'उद्गीथ' शब्दसे उद्गीथभक्तिके अक्षर न समझ लिये जायँ इसलिये 'उद्गीथ' यह विशेषण लगाते हैं। तात्पर्य यह है कि 'उद्गीथ' इस नामके अक्षरोंकी उपासना करे; क्योंकि 'अमुक मिश्र' ऐसा कहनेसे जैसे उस नामवाले व्यक्ति-विशेषका बोध होता है, उसी प्रकार नामके अक्षरोंकी उपासना करनेसे भी नामीकी ही उपासना की जाती है।<br><br>प्राण ही 'उत्' है, अर्थात् 'उत्' इस अक्षरमें प्राणदृष्टि करनी चाहिये। प्राण किस प्रकार 'उत्' है सो बतलाते हैं—सब लोग प्राणसे ही उठते हैं, क्योंकि प्राणहीनकी शिथिलता देखी गयी है; अतः उत् और प्राणकी समानता स्पष्ट ही है। वाक् 'गी' है; क्योंकि शिष्ट लोग वाक्‌को 'गिरा' ऐसा कहते हैं तथा अन्न 'थ' है, क्योंकि अन्नमें ही यह सब स्थित है; अतः अन्न और थ अक्षरकी समानता है ॥ ६ ॥