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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

| ७०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |

७०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तोऽस्मीत्यात्मनि यद्विज्ञानमभूतस्य, यत्सज्जगतो मूलमेकमेवाद्वितीयं तत्त्वमसीत्यनेन वाक्येन प्रतिबुद्धस्य निवर्तते, विरोधात् । न ह्येकस्मिन्नद्वितीये आत्मन्ययमहमस्मीति विज्ञाते ममेदमन्यदनेन कर्तव्यमिदं कृत्वास्य फलं भोक्ष्य इति वा भेदविज्ञानमुपपद्यते । तस्मात्सत्सत्याद्वितीयात्मविज्ञाने विकारानृतजीवात्मविज्ञानं निवर्तत इति युक्तम् ।<br><br>ननु तत्त्वमसीत्यत्र त्वंशब्दवाच्येऽर्थे सद्बुद्धिरादिश्यते यथादित्यमनआदिषु ब्रह्मादिबुद्धिः । यथा च लोके प्रतिमादिषु विष्ण्वादिबुद्धिस्तद्वन्न तु सदेव त्वमिति । यदि सदेव श्वेतकेतुः स्यात्कथमात्मानं न विजानीयाद्येन तस्मै तत्त्वमसीत्युपदिश्यते । | था, वह — जो एकमात्र अद्वितीय सत् जगत्का मूल है वही तू है— इस वाक्यद्वारा जग उठनेपर निवृत्त हो जाता है, क्योंकि [ पूर्व मिथ्या ज्ञानसे ] इसका विरोध है । कारण, एकमात्र अद्वितीय आत्माके विषयमें 'यह मैं हूँ'—ऐसा ज्ञान हो जानेपर 'मुझे अपना यह अन्य कर्तव्य इस साधनसे करना चाहिये, इसे करनेपर मैं इसका फल भोगूँगा।' इस प्रकारकी भेदबुद्धि होनी सम्भव नहीं है । अतः सद्रूप सत्य और अद्वितीय आत्माका ज्ञान होनेपर विकाररूप मिथ्या जीवात्मबुद्धिकी निवृत्ति हो जाती है—यह कथन ठीक ही है ।<br><br>पूर्व०—किंतु जिस प्रकार आदित्य और मन आदिमें ब्रह्मादिबुद्धिका तथा लोकमें प्रतिमा आदिमें विष्णुबुद्धिका आरोप किया जाता है उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इस वाक्यके द्वारा 'त्वम्' शब्दके वाच्यार्थमें तो सद्बुद्धिका आरोप ही किया जाता है । वस्तुतः त्वमर्थ सत् ही नहीं है। यदि श्वेतकेतु सत् ही होता तो अपनेको क्यों न जानता, जिससे कि उसे 'तू वह है' इस प्रकार उपदेश किया गया । |

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
तत्परिहारः<br>न; आदित्यादिवाक्यवैलक्षण्यात् । आदित्यो ब्रह्मेत्यादावितिशब्दव्यवधानान्न साक्षाद्ब्रह्मत्वं गम्यते । रूपादिमत्त्वाच्चादित्यादीनामाकाशमनसोश्चेतिशब्दव्यवधानादेवाब्रह्मत्वम् । इह तु सत एवेह प्रवेशं दर्शयित्वा तत्त्वमसीति निरङ्कुशं सदात्मभावमुपदिशति ।सिद्धान्ती— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' इत्यादि वाक्योंसे इस वाक्यमें विलक्षणता है। 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' आदि वाक्योंमें 'इति' शब्दका व्यवधान रहनेके कारण उनका साक्षात् ब्रह्मत्व ज्ञात नहीं होता। इसके सिवा आदित्यादि रूपवान् होनेके कारण तथा आकाश और मनके 'इति' शब्दसे व्यवधान होनेके कारण वे ब्रह्म नहीं हो सकते। किंतु इस प्रसङ्गमें तो [ आरुणि ] सत्‌का ही इस (तेजोऽवन्नमय-संघात) में प्रवेश दिखलाकर 'तू वह है' इस प्रकार निरंकुश सदात्मभावका उपदेश करता है।
ननु पराक्रमादिगुणः सिंहोऽसि त्वमितिवत्तत्त्वमसीति स्यात् ।पूर्व० — जिस प्रकार पराक्रमादि गुणवाला 'तू सिंह है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार 'तू वह है' यह वाक्य भी तो हो सकता है ?
न; मृदादिवत्सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमित्युपदेशात् । न चोपचारविज्ञानात्तस्य तावदेव चिरमिति सत्सम्पत्तिरुपदिश्येत ।सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि 'मृत्तिकादिके समान एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है' ऐसा उपदेश किया गया है। औपचारिक विज्ञानके द्वारा उसे तभीतक विलम्ब है' इस प्रकार सत्की प्राप्तिका उपदेश नहीं किया जा