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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

६७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६७४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| न्तश्रुतेश्च चेतनावन्तः स्थावरा इति बौद्धकाणादमतमचेतनाः स्थावरा इत्येतदसारमिति दर्शितं भवति ॥ २ ॥ | प्रभूतः'] इस दृष्टान्तश्रुतिसे यह निश्चित होता है कि स्थावर चेतनायुक्त होते हैं और इससे यह भी प्रदर्शित हो जाता है कि 'स्थावर चेतनाशून्य होते हैं' ऐसा बौद्ध और काणादमत सारहीन है ॥ २ ॥ |

—: ० :—

| यथास्मिन्वृक्षदृष्टान्ते दर्शितं जीवेन युक्तो वृक्षोऽशुष्को रसपानादियुक्तो जीवतीत्युच्यते तदपेतश्च म्रियत इत्युच्यते — | जिस प्रकार कि इस वृक्षके दृष्टान्तमें यह दिखलाया गया है कि जीवसे युक्त वृक्ष अशुष्क और रसपानादिसे युक्त रहता है; इसलिये 'वह जीवित है'—ऐसा कहा जाता है तथा उस (जीव) से रहित हो जानेपर 'मर जाता है' ऐसा कहा जाता है— |

एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवसे रहित होनेपर यह शरीर मर जाता है, जीव नहीं मरता'—ऐसा [ आरुणिने ] कहा, 'वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है ।' [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

खण्ड ११] शाङ्करभाष्यार्थ ६७५


| एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच। जीवापेतं जीववियुक्तं वाव किलेदं शरीरं म्रियते न जीवो म्रियत इति। कार्यशेषे च सुप्तोत्थितस्य ममेदं कार्यशेषमपरिसमाप्तमिति स्मृत्वा समापनदर्शनात्। जातमात्राणां च जन्तूनां स्तन्याभिलाषभयादिदर्शनाच्चातीतजन्मान्तरानुभूतस्तनपानदुःखानुभवस्मृतिर्गम्यते अग्निहोत्रादीनां च वैदिकानां कर्मणामर्थवत्त्वान्न जीवो म्रियत इति। स य एषोऽणिमेत्यादि समानम्। <br><br> कथं पुनरिदमत्यन्तस्थूलं पृथिव्यादि नामरूपवज्जगदत्यन्तसूक्ष्मात्सद्रूपान्नामरूपरहितात् सतो जायत इत्येतद्दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति। तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ३ ॥ | 'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवापेत—जीवसे वियुक्त हुआ यह शरीर ही मरता है जीव नहीं मरता' ऐसा [आरुणिने] कहा, क्योंकि कार्य शेष रहनेपर ही सोकर उठे हुए पुरुषको 'मेरा यह काम शेष रह गया था' ऐसा स्मरण करके उसे समाप्त करते देखा जाता है। तथा तत्काल उत्पन्न हुए जीवोंको स्तनपानकी अभिलाषा और भय आदि होते देखे जानेसे पूर्वजन्मोंमें अनुभव किये हुए स्तनपान तथा दुःखानुभवकी स्मृतिका ज्ञान होता है। इसके सिवा अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मोंकी सार्थकता होनेके कारण भी जीव नहीं मरता।' 'स य एषोऽणिमा' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। <br><br> 'किंतु यह अत्यन्त स्थूल 'पृथिवी' आदि नाम और रूपोंवाला संसार अत्यन्त सूक्ष्म, सद्रूप, नामरूपरहित सत्‌से किस प्रकार उत्पन्न होता है ? इस बातको हे भगवन् ! मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये'—ऐसा श्वेतकेतुने कहा । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥


छा० उ० २२—

द्वादश खण्ड

— : o : —

न्यग्रोधफलके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

यद्येतत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि—यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता है तो—

न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥

इस (सामनेवाले वटवृक्ष) से एक बड़का फल ले आ। [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! यह ले आया।' [ आरुणि— ] 'इसे फोड़' [ श्वेत०— ] 'भगवन् ! फोड़ दिया।' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [श्वेत०—] 'भगवन् ! इसमें ये अणुके समान दाने हैं।' [आरुणि—] 'अच्छा वत्स ! इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत०—] 'फोड़ दिया भगवन् !' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [ श्वेत०— ] 'कुछ नहीं भगवन् !' ॥ १ ॥

अतोऽस्मान्महतो न्यग्रोधात् फलमेकमाहरेत्युक्तस्तथा चकार स इदं भगव उपहृतं फलमिति दर्शितवन्तं प्रत्याह फलं भिन्द्धीति भिन्नमित्याहेतरः । तमाह पिता किमत्र पश्यसीत्युक्त आ-इस महान् वटवृक्षसे एक फल ले आ। ऐसा कहे जानेपर उसने वैसा ही किया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मैं यह फल ले आया' इस प्रकार फल दिखलानेवाले उससे [ आरुणिने ] कहा—'इस फलको फोड़ !' इसपर श्वेतकेतु बोला—'फोड़ दिया।' उससे पिताने कहा—'इसमें तू क्या देखता है ?' इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला—

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७


| हाण्व्याऽणुतरा इवेमा धाना बीजानि पश्यामि भगव इति । आसां धानानामेकां धानामङ्ग हे वत्स भिन्द्धीत्युक्त आह भिन्ना भगव इति । यदि भिन्ना धाना तस्यां भिन्नायां किं पश्यसीत्युक्त आह न किञ्चन पश्यामि भगव इति ॥ १ ॥ | ‘भगवन् ! मैं इसमें ये अणु-अणुतर अत्यन्त छोटे दाने—बीज देखता हूँ।’ [ आरुणि— ] ‘हे वत्स ! इन धानोंमेंसे तू एक धानेको फोड़।’ इस प्रकार कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! फोड़ दिया।’ [ आरुणि— ] ‘अच्छा, यदि तूने धाना फोड़ दिया तो उस फूटे हुए धानेमें तू क्या देखता है ?’ ऐसा कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! मैं कुछ नहीं देखता’ ॥१॥ |

—: ० :—

तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥

तब उससे ( आरुणिने ) कहा—‘हे सोम्य ! इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता हे सोम्य ! उस अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है । हे सोम्य ! तू [इस कथनमें] श्रद्धा कर’ ॥२॥

| तं पुत्रं होवाच वटधानायां भिन्नायां यं वटबीजाणिमानं हे सोम्यैतं न निभालयसे न पश्यसि । तथाप्येतस्य वै किल सोम्यैष महान्न्यग्रोधो बीजस्या- | उस पुत्रसे ( आरुणिने ) कहा— ‘हे सोम्य ! वटके दानेके टूटनेपर जिस वटबीजकी अणिमाको तू नहीं देखता, तथापि हे सोम्य ! देख, निश्चय उसी बीजकी दिखायी न देनेवाली सूक्ष्म अणिमाका कार्यभूत |