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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

६३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| कलातिशिष्टाभूदतिशिष्टासीत् पञ्चदशाहान्यभुक्तवत एकैकैनाह्नैवैका कला चन्द्रमस इवापरपक्षे क्षीणा, सातिशिष्टा कला त्वान्नेन भुक्तेनोपसमाहिता वर्धितोपचिता प्राज्वाली, दैर्घ्यं छान्दसम्, प्रज्वलिता वर्धितेत्यर्थः। प्राज्वालीदिति वा पाठान्तरम्, तदा तेनोपसमाहिता स्वयं प्रज्वलितवतीत्यर्थः । तया वर्धितयैतर्हीदानीं वेदाननुभवस्युपलभसे । <br><br> एवं व्यावृत्यनुवृत्तिभ्यामन्नमयत्वं मनसः सिद्धमित्युपसंहरति-अन्नमयं हि सोम्य मन इत्यादि । यथैतन्मनसोऽन्नमयत्वं तव सिद्धं तथापोमयः प्राणस्तेजोमयी वागित्येतदपि सिद्धमेवेत्यभिप्रायः । तदेतद्धास्य | कलाओंमेंसे केवल एक कला अवशिष्ट रह गयी थी । पंद्रह दिन भोजन न करनेसे कृष्णपक्षके चन्द्रमाके समान एक-एक दिनमें तेरी एक-एक कला क्षीण हो गयी थी । वह बची हुई कला तेरे भक्षण किये हुए अन्नद्वारा उपसमाहित—वर्धित, पुष्ट अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी । 'प्राज्वाली' इस पदमें दीर्घ ईकार छान्दस है अथवा 'प्राज्वालीत्' ऐसा पाठान्तर समझना चाहिये । उस अवस्थामें इसका ऐसा अर्थ होगा कि उसके द्वारा आधान हो जानेपर वह स्वयं प्रज्वलित हो गयी । उस वृद्धिको प्राप्त की हुई कलासे ही तू इस समय वेदोंका अनुभव करता है अर्थात् तुझे उनकी उपलब्धि होती है । <br><br> इस प्रकार व्यावृति और अनुवृत्ति दोनोंहीके द्वारा मनकी अन्नमयता सिद्ध है । इसीसे 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इत्यादि वाक्यसे श्रुति इसका उपसंहार करती है । जिस प्रकार तुझे यह मनकी अन्नमयता सिद्ध हुई है उसी प्रकार प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है—यह भी सिद्ध ही है—ऐसा |

खण्ड ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ६३१

| पितुरुक्तं मनआदीनामन्नादिमयत्वं विज्ञौ विज्ञातवाञ्श्वेतकेतुः । द्विरभ्यासस्त्रिवृत्करणप्रकरणसमाप्त्यर्थः ॥ ६ ॥ | इसका तात्पर्य है । इस प्रकार पिताके कहे हुए इस मन आदिके अन्नादिमयत्वको श्वेतकेतु विशेष-रूपसे समझ गया । 'विज्ञौ इति' इन पदोंकी द्विरुक्ति त्रिवृत्करणके प्रकरणकी समाप्तिके लिये है ॥६॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥

अष्टम खण्ड

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सुषुप्तिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश

यस्मिन्मनसि जीवेनात्मनानुप्रविष्टा परा देवता—आदर्श इव पुरुषः प्रतिबिम्बेन जलादिष्विव च सूर्यादयः प्रतिबिम्बैः, तन्मनोऽन्नमयं तेजोऽम्मयाभ्यां वाक्प्राणाभ्यां संगतमधिगतम् । यन्मयो यत्स्थश्च जीवो मननदर्शनश्रवणादिव्यवहाराय कल्पते तदुपरमे च स्वं देवतारूपमेव प्रतिपद्यते ।दर्पणमें प्रतिबिम्बरूपसे प्रविष्ट हुए पुरुष और जलादिकमें आभासरूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिकके समान जिस मनमें परदेवता जीवात्मरूपसे अनुप्रविष्ट हुआ है और जिसमें स्थित हुआ तथा जिससे तादात्म्यको प्राप्त हुआ जीव मनन, दर्शन एवं श्रवणादि व्यापारमें समर्थ होता है तथा जिसके निवृत्त होनेपर वह अपने परदेवतारूपको ही प्राप्त हो जाता है वह मन अन्नमय है और तेजोमयी वाक् एवं जलमय प्राणके साथ सम्बद्ध है—ऐसा ज्ञात हुआ।
तदुक्तं श्रुत्यन्तरे—‘‘ध्यायतीव लेलायतीव सधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति’’ (बृ० उ० ४ । ३ । ७) ‘‘स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः’’ (बृ० उ० ४ । ४ । ५) इत्यादि ‘‘स्वप्नेन शारीरम्’’ (बृ० उ० ४ । ३ । ११)इस विषयमें अन्य (वाजसनेय) श्रुतिमें भी ऐसा कहा है—‘‘[मन और प्राणसे सम्बद्ध हुआ यह आत्मा] मानो ध्यान-सा करता है, चेष्टा-सी करता है, वह वासनायुक्त हुआ स्वप्नरूप होकर इस लोकका अतिक्रमण कर जाता है’’ ‘‘वह यह आत्मा ब्रह्म विज्ञानमय और मनोमय है’’ इत्यादि, तथा ‘‘स्वप्नसे शरीरको [निश्चेष्ट कर]’’ इत्यादि

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४१


| इत्यादि "प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति" (बृ० उ० १।४।७) इत्यादि च । | एवं "वह आत्मा प्राणनक्रिया करनेसे प्राण नामवाला हो जाता है" इत्यादि भी कहा है। |
| तस्यास्य मनःस्थस्य मनआख्यां गतस्य मनउपशमद्वारेणेन्द्रियविषयेभ्यो निवृत्तस्य यस्यां परस्यां देवतायां स्वात्मभूतायां यदवस्थानं तत्पुत्रायाचिख्यासुः— | उस इस मनःस्थित-मनसंज्ञाको प्राप्त हुए तथा मनकी निवृत्तिके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंसे निवृत्त हुए जीवका जो अपने स्वरूपभूत परदेवतामें स्थित होना है, उसका अपने पुत्रके प्रति वर्णन करनेकी इच्छावाले— |

उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥

उद्दालकके नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे कहा—'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा स्वप्नान्त ( सुषुप्ति अथवा स्वप्नके स्वरूप ) को विशेषरूपसे समझ ले; जिस अवस्थामें यह पुरुष 'सोता है' ऐसा कहा जाता है, उस समय हे सोम्य ! यह सत्‌से सम्पन्न हो जाता है—यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीसे इसे 'स्वपिति' ऐसा कहते हैं; क्योंकि उस समय यह स्व—अपनेको ही अपीत—प्राप्त हो जाता है ॥१॥

| उद्दालको ह किलारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाचोक्तवान्— | उद्दालक नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे कहा— |
| स्वप्नान्तं स्वप्नमध्यम्, स्वप्न इति दर्शनवृत्तेः स्वप्नस्याख्या, तस्य | स्वप्नान्त—स्वप्नका मध्य, 'स्वप्न' यह दर्शनवृत्ति [ अर्थात् जिसमें वासनारूप विषयोंके दर्शनकी वृत्ति |