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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५८०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

हे सोम्य ! जिस प्रकार एक नखकृन्तन ( नहन्ना ) के ज्ञानसे सम्पूर्ण लोहेके पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है, सत्य केवल लोहा ही है; हे सोम्य ! ऐसा ही वह आदेश भी है ॥ ६ ॥

यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेनोपलक्षितेन कृष्णायसपिण्डेनेत्यर्थः, सर्वं कार्ष्णायसं कृष्णायसविकारजातं विज्ञातं स्यात्; समानमन्यत् । अनेकदृष्टान्तोपादानं दार्ष्टान्तिकानेकभेदानुगमार्थं दृढप्रतीत्यर्थं च, एवं सोम्य स आदेशो यो मयोक्तो भवति ॥ ६ ॥‘हे सोम्य ! जिस प्रकार एक नखकृन्तनसे अर्थात् उससे उपलक्षित लोहपिण्डसे सम्पूर्ण कार्ष्णायस—लोहेका विकारसमूह जान लिया जाता है। शेष सब पूर्ववत् है। यहाँ जो अनेक दृष्टान्त लिये गये हैं वे दार्ष्टान्तके अनेक भेदोंका बोध और दृढ़ प्रतीति करानेके लिये हैं—हे सोम्य ! ऐसा ही वह आदेश है जो कि मैंने कहा है’ ॥ ६ ॥

इत्युक्तवति पितर्याहेतरः—पिताके इस प्रकार कहनेपर दूसरा ( श्वेतकेतु ) बोला—

न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्धचेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥

‘निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते थे। यदि वे जानते तो मुझसे क्यों न कहते । अब आप ही मुझे वह बतलाइये।’ तब पिताने कहा—‘अच्छा, सोम्य ! बतलाता हूँ’ ॥ ७ ॥

खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ५८१
न वै नूनं भगवन्तः पूजा- <br> वन्तो गुरवो मम ये त एतद्यद्भव- <br> वदुक्तं वस्तु नावेदिषुर्न विज्ञात- <br> वन्तो नूनम् । यद्यदि ह्यवेदि- <br> ष्यन्विदितवन्त एतद्वस्तु कथं मे <br> गुणवते भक्तायानुगताय नाव- <br> क्ष्यन्नोक्तवन्तस्तेनाहं मन्ये न <br> विदितवन्त इति । अवाच्यमपि <br> गुरोर्न्यूनभावमवादीत्पुनर्गुरुकुलं <br> प्रति प्रेषणभयात् । अतो भगवां- <br> स्त्वेव मे मह्यं तद्वस्तु येन सर्व- <br> ज्ञत्वं ज्ञातेन मे स्यात्तद्ब्रवीतु <br> कथयत्वित्युक्तः पितोवाच तथा- <br> स्तु सोम्येति ॥ ७ ॥निश्चय ही, मेरे जो पूज्य गुरुदेव <br> थे, वे आपकी कही हुई इस बातको <br> नहीं जानते थे । यदि वे जानते <br> अर्थात् उन्हें इस बातका पता होता <br> तो मुझ गुणवान् भक्त एवं अपने <br> अनुगत शिष्यके प्रति क्यों न <br> कहते । इससे मैं समझता हूँ उन्हें <br> इसका पता नहीं था । कहने योग्य <br> न होनेपर भी उसने फिर गुरुकुलको <br> भेजे जानेके भयसे गुरुका लघुत्व <br> कह डाला । अतः अब आप ही <br> मेरे प्रति उस वस्तुका वर्णन कीजिये <br> जिसका ज्ञान होनेपर मुझे सर्वज्ञत्व <br> प्राप्त हो जाय । इस प्रकार कहे <br> जानेपर पिताने कहा—'सोम्य ! <br> अच्छा, ऐसा ही हो' ॥ ७ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥

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द्वितीय खण्ड

-: ० :-

अन्य पक्षके खण्डनपूर्वक जगत्‌की सद्‌रूपताका समर्थन

सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक
आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः
सज्जायत ॥ १ ॥

हे सोम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था । उसीके विषयमें किन्हींने ऐसा भी कहा कि आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था । उस असत्‌से सत्‌की उत्पत्ति होती है ॥ १ ॥

सदेव सदित्यस्तितामात्रं वस्तु सूक्ष्मं निर्विशेषं सर्वगतमेकंनिरञ्जनं निरवयवं विज्ञानं यदवगम्यते सर्ववेदान्तेभ्यः । एवशब्दोऽवधारणार्थः । किं तदवध्रियत इत्याह—इदं जगन्नामरूपक्रियावद्विकृतमुपलभ्यते यत्तत्सदेवासीदित्यासीच्छब्देन संबध्यते ।‘सदेव’—‘सत्’ यह अस्तित्वमात्र वस्तुका बोधक है, जो कि सम्पूर्ण वेदान्तोंसे सूक्ष्म, निर्विशेष, सर्वगत, एक, निरञ्जन, निरवयव और विज्ञानस्वरूप जानी जाती है। ‘एव’ शब्द निश्चयार्थक है । इससे किस वस्तुका निश्चय किया जाता है—यह [आरुणि] बतलाता है—यह जो नामरूप एवं क्रियावान् विकारी जगत् दिखायी देता है ‘सत्’ ही था—इस प्रकार ‘आसीत्’ (था) शब्दसे ‘सत्’ शब्दका सम्बन्ध है ।
कदा सदेवेदमासीदित्युच्यते ?शङ्का—यह किस समय सत ही था—ऐसा कहा जाता है ?

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
अग्रे जगतः प्रागुत्पत्तेः।समाधान— आगे अर्थात् जगत्‌की उत्पत्तिके पूर्व।
किं नेदानीमिदं सद्येनाग्र आसीदिति विशेष्यते ?शङ्का— तो क्या इस समय यह सत्‌ नहीं है जो 'आरम्भमें था' इस प्रकार विशेषण दिया गया है ?
न।समाधान— नहीं, ऐसी बात नहीं है।
कथं तर्हि विशेषणम् ?शङ्का— तो फिर यह विशेषण क्यों दिया गया है ?
इदानीमपीदं सदेव किं तु<br>(जगतः सदैव सन्मात्रत्वे सहेतु-दृष्टान्तप्रदर्शनम्)<br>नामरूपविशेषणवदिदंशब्दबुद्धिविषयं चेतीदं च भवति। प्रागुत्पत्तेस्त्वग्रे केवलसच्छब्दबुद्धिमात्रगम्यमेवेति सदेवेदमग्र आसीदित्यवधार्यते। न हि प्रागुत्पत्तेर्नामवद्रूपवद्वेदमिति ग्रहीतुं शक्यं वस्तु सुषुप्तकाल इव। यथा सुषुप्तादुत्थितः सत्त्वमात्रमवगच्छति सुषुप्ते सन्मात्रमेव केवलं वस्त्विति तथा प्रागुत्पत्तेरित्यभिप्रायः।समाधान— इस समय भी यह सत्‌ ही है; किंतु नामरूप विशेषणयुक्त तथा इदं शब्द और इदं बुद्धिका विषय होनेके कारण 'इदम्‌' (यह) इस प्रकार भी निर्देश किया जाता है। किन्तु उत्पत्तिके पूर्व आरम्भमें केवल सत्‌ शब्द और सद्बुद्धिका ही विषय होनेके कारण 'यह पहले सत्‌ ही था' इस प्रकार निश्चय किया जाता है। सुषुप्तकालके समान उत्पत्तिसे पूर्व यह नामयुक्त अथवा रूपयुक्त है इस प्रकार वस्तुका ग्रहण नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार सोनेसे उठा हुआ पुरुष वस्तुकी सत्तामात्रका अनुभव करता है अर्थात् केवल इतना जानता है कि सुषुप्तिमें केवल सन्मात्र वस्तु थी, उसी प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व जगत्‌ था—ऐसा इसका अभिप्राय है।