छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
५६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा ( द्युलोक ) है, चक्षु विश्वरूप ( सूर्य ) है, प्राण पृथग्वर्त्मा ( वायु ) है, देहका मध्यभाग बहुल ( आकाश ) है, बस्ति ही रयि ( जल ) है, पृथिवी ही दोनों चरण हैं, वक्षःस्थल वेदी है, लोम दर्भ है, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है और मुख आहवनीय है ॥ २ ॥
| तस्य ह वै प्रकृतस्यैवैतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ । अथवा विध्यर्थमेतद्वचनमेवमुपास्य इति ।<br><br>अथेदानीं वैश्वानरविदो भोजनेऽग्निहोत्रं संपिपादयिषन्नाह—एतस्य वैश्वानरस्य भोक्तुरुर एव वेदिराकारसामान्यात् । लोमानि बर्हिर्वेद्यामिवोरसि लोमान्यास्तीर्णानि दृश्यन्ते । हृदयं गार्हपत्यो हृदयाद्धि मनः प्रणीतमिवानन्तरीभवत्यतोऽन्वाहार्यपचनोऽग्निर्मनः । आस्यं मुखमाहवनीय इवाहवनीयो हूयतेऽस्मिन्नन्नमिति ॥ २ ॥ | उस इस प्रकृत वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा है, चक्षु विश्वरूप है, प्राण पृथग्वर्त्मारूप वायु है, शरीरका मध्यभाग बहुल है, बस्ति ही रयि है और पृथिवी ही चरण हैं । अथवा यह वाक्य विधिके लिये है; अर्थात् इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये ।<br><br>अब इससे आगे वैश्वानरवेत्ताके भोजनमें अग्निहोत्रका निश्चय करनेकी इच्छासे राजा कहता है—इस वैश्वानर यानी भोक्ताका वक्षःस्थल ही आकारमें समान होनेके कारण वेदी है, लोम कुशाएँ हैं क्योंकि वेदीमें बिछे हुए कुशोंके समान वे वक्षःस्थलपर बिछे हुए दिखायी देते हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है क्योंकि मन हृदयसे ही उत्पन्न-सा होकर उसका अन्तर्वर्ती होता है; इसीलिये मन अन्वाहार्यपचन अग्नि है तथा आस्य—मुख आहवनीयाग्निके समान आहवनीय है क्योंकि इसमें अन्नका हवन होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१८॥
एकोनविंश खण्ड
भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये 'प्राणाय स्वाहा' इस पहली आहुतिका वर्णन
तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयꣳस यां प्रथमा-
माहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृ-
प्यति ॥ १ ॥
अतः जो अन्न पहले आवे, उसका हवन करना चाहिये, उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कह-कर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्तत्रैवं सति यद्भक्तं भोजन-काल आगच्छेद्भोजनार्थम्, तद्धोमीयं तद्धोतव्यम्, अग्निहोत्रसंपन्मात्रस्य विवक्षितत्वा-न्नाग्निहोत्राङ्गेतिकर्तव्यताप्रा-प्तिरिह; स भोक्ता यां प्रथमा-माहुतिं जुहुयात्तां कथं जुहु-यात् ? इत्याह-प्राणाय स्वाहे-त्यनेन मन्त्रेणाहुतिशब्दादवदा-नप्रमाणमन्नं प्रक्षिपेदित्यर्थः ।<br><br>तेन प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ | अतः ऐसा होनेके कारण भोजनके समय जो भात (अन्न) आवे उससे हवन करना चाहिये। यहाँ अग्निहोत्रकी कल्पनामात्र विवक्षित है इसलिये अग्निहोत्रकी अङ्गभूत इतिकर्तव्यता (सहकारी साधनों) की प्राप्ति नहीं है। वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे किस प्रकार दे? सो श्रुति बतलाती है—'प्राणाय स्वाहा' इस मन्त्रसे, यहाँ 'आहुति' शब्द होनेके कारण अवदानप्रमाण (जितना कि आहुतिमें विहित है उतना) अन्न [मुखमें] डाले—ऐसा इसका तात्पर्य है। उससे प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥ |