सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

तदुपासनात्तव बहु विश्वरूपमिहामुत्रार्थमुपकरणं दृश्यते कुले ॥ १ ॥उपासनाके कारण तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप ऐहिक और पारलौकिक साधन दिखायी देता है ॥ १ ॥
<center>—: ० :—</center>
किं च त्वामनु--तथा तुम्हारे पीछे—

प्रवृत्तोऽश्वतरोरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और दासियोंके सहित हार प्रवृत्त है। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका नेत्र ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा—'यदि तुम मेरे पास न आते तो अंधे हो जाते' ॥ २ ॥

प्रवृत्तोऽश्वतरीभ्यां युक्तो रथाऽश्वतरीरथो दासीनिष्को दासीभिर्युक्तो निष्को हारो दासीनिष्कः । अत्स्यन्नमित्यादि समानम् । चक्षुर्वैश्वानरस्य तु सविता । तस्य समस्तबुद्धयोपासनादन्धोऽभविष्यश्चक्षुर्हीनोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति पूर्ववत् ॥ २ ॥'अश्वतरोरथ—दो खच्चरियोंसे युक्त रथ और दासीनिष्क—दासियोंसे युक्त निष्क यानी हार प्रवृत्त है। 'अत्स्यन्नम्' इत्यादिका तात्पर्य पूर्ववत् है। किंतु सूर्य वैश्वानरका नेत्र ही है। उसकी समस्त बुद्धिसे उपासना करनेके कारण, यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते'—ऐसा पूर्ववत् जानना चाहिये ॥ २ ॥
<center>—: ० :—</center> <center>

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

—: ० :—

</center>

चतुर्दश खण्ड

--: ३ :--

अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद

अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्व-
मात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष
वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां
पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥

तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्मा है; इसीसे तुम्हारे प्रति पृथक्-पृथक् उपहार आते हैं और तुम्हारे पीछे पृथक् पृथक् रथकी पङ्क्तियाँ चलती हैं' ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्से इत्यादि समानम् । पृथग्वर्त्मा नाना वर्त्मानि यस्य वायोरावहोद्वहादिभिर्भेदैर्वर्तमानस्य सोऽयं पृथग्वर्त्मा वायुः । तस्मात्पृथग्वर्त्मात्मनो वैश्वानरस्योपासनात्पृ-तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । पृथग्वर्त्मा—आवह, उद्वह आदि भेदोंसे विद्यमान जिस वायुके अनेकों मार्ग हैं वह वायु पृथग्वर्त्मा है । 'अतः पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्माकी उपासना करनेके कारण तुम्हारे पास पृथक्