छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| देवताः क्रमेण विचार्यासुरेण पाप्मना विद्धा इत्यपोह्यन्ते । समानमन्यत् । अथ ह वाचं चक्षुः श्रोत्रं मन इत्यादि । अनुक्ता अप्यन्यास्त्वग्रसनादिदेवता द्रष्टव्याः “एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिः”(बृ०उ० १।३।६) इति श्रुत्यन्तरात्॥ ३–६॥ | देवता आसुर पापसे विद्ध हैं—इस प्रकार क्रमशः विचार करके उनका अपवाद किया जाता है। शेष सब भी इसीके समान हैं। इसी प्रकार उन्होंने वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन आदिको भी [पापसे विद्ध कर दिया] “इस प्रकार निश्चय ही ये देवता पापसे संयुक्त हैं” इस अन्य श्रुतिके अनुसार, यहाँ जिनका नाम नहीं लिया गया है, उन त्वक् एवं रसना आदि अन्य देवताओंको भी ऐसे ही पापविद्ध समझना चाहिये ॥ ३–६ ॥ |
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मुख्य प्राणद्वारा असुरोंका पराभव
| आसुरेण विद्धत्वादघ्राणादिदेवता अपोह्य— | आसुर पापसे विद्ध होनेके कारण घ्राणादि देवताओंका त्याग कर— |
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अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तँहासुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेत ॥ ७ ॥
फिर यह जो प्रसिद्ध मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। उस (प्राणके) समीप पहुँचकर असुरगण इस प्रकार विध्वस्त हो गये जैसे दुर्भेद्य पाषाणके पास पहुँचकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है ॥७॥
| अथानन्तरं य एवायं प्रसिद्धो मुखे भवो मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तं हासुराः पूर्व- | अथ--इसके पश्चात् जो कि यह प्रसिद्ध मुख्य—मुखमें रहनेवाला प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की । असुरगण पूर्ववत् |
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५५ |
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| बद्दृत्वा प्राप्य विदध्वंसुर्विनेशुः, अभिप्रायमात्रेण, अकृत्वा किंचिदपि प्राणस्य । <br> कथं विनेशुः ? इत्यत्र दृष्टान्तमाह—यथा लोकेऽश्मानमाखणं—न शक्यते खनितुं कुद्दालादिभिरपि, टङ्कैश्चच्छेत्तुं न शक्योऽखणः, अखण एव आखणस्तमृत्वा सामर्थ्याल्लोष्टः पांसुपिण्डः श्रुत्यन्तराच्चाश्मनि क्षिप्तोऽश्मभेदनाभिप्रायेण तस्याश्मनः किंचिदप्यकृत्वा स्वयं विध्वंसेत विदीर्येतैव विद्ध्वंसुरित्यर्थः । एवं विशुद्धोऽसुरैरधर्षितत्वात् प्राण इति ॥ ७ ॥ | उसे प्राप्त होते ही—प्राणका कुछ भी न बिगाड़कर केवल उसे विद्ध करनेका संकल्प करके ही विध्वस्त हो गये । <br> वे किस प्रकार नष्ट हो गये ? इसमें दृष्टान्त कहते हैं—जिस प्रकार लोकमें आखण—पाषाणको प्राप्त होकर—जिसे कुद्दालादिसे भी न खोदा जा सके तथा जो टाँकियोंसे भी छिन्न न किया जा सके उसे 'अखण' कहते हैं, 'अखण' ही 'आखण' (अभेद्य) कहा गया है उसीको प्राप्त होकर अर्थात् पाषाणकी ओर उसे फोड़नेके अभिप्रायसे फेंका हुआ लोष्ट-पांसुपिण्ड यानी मिट्टीका ढेला उस पत्थरका कुछ भी न बिगाड़ कर स्वयं नष्ट हो जाता है उसी प्रकार वे असुर भी विनष्ट हो गये । इस प्रकार असुरोंसे पराभूत न होनेके कारण मुख्य प्राण शुद्ध रहा—यह इसका तात्पर्य है । यहाँ प्रकरणके सामर्थ्यसे और दूसरी श्रुतिके अनुसार 'लोष्ट' शब्द अध्याहृत किया गया है। ७। |
प्राणोपासकका महत्त्व
| एवंविदः प्राणात्मभूतस्येदं फलमाह— | इस प्रकार जाननेवाले प्राणात्मभूत व्यक्तिके लिये श्रुति यह फल बतलाती है— |
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