छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| रूपलक्षणमारभन्त इत्युक्तं तथेमा अग्निहोत्राहुतिसमवायिन्यः सूक्ष्माः श्रद्धाशब्दवाच्या आपो द्युलोकमनुप्रविश्य चान्द्रं कार्यमारभन्ते फलरूपमग्निहोत्राहुत्योः। <br><br> यजमानाश्च तत्कर्त्तार आहुतिमया आहुतिभावनाभाविता आहुतिरूपेण कर्मणाकृष्टाः श्रद्धाप्समवायिनो द्युलोकमनुप्रविश्य सोमभूता भवन्ति । तदर्थं हि तैरग्निहोत्रं हुतम् । अत्र त्वाहुतिपरिणाम एव पञ्चाग्निसंबन्धक्रमेण प्राधान्येन विवक्षित उपासनार्थं न यजमानानां गतिः । तां त्वविदुषां धूमादिक्रमेणोत्तरत्र वक्ष्यति विदुषां चोत्तरां विद्याकृताम् ॥ २ ॥ | यज्ञ आदि कार्य आरम्भ करते हैं, उसी प्रकार अग्निहोत्रकी आहुतियोंसे सम्बद्ध ये 'श्रद्धा' शब्दवाच्य सूक्ष्म जल द्युलोकमें प्रवेश कर अग्निहोत्रकी आहुतियोंका फलरूप चन्द्रमासम्बन्धी कार्य आरम्भ करते हैं । <br><br> तथा उस हवनके करनेवाले यजमान आहुतिमय—आहुतिकी भावनासे भावित आहुतिरूप कर्मसे आकर्षित हो श्रद्धारूप जलसे पूर्ण हो द्युलोकमें प्रवेश कर चन्द्रमारूप हो जाते हैं, क्योंकि उसीके लिये उन्होंने अग्निहोत्र किया था; किंतु यहाँ तो उपासनाके लिये प्रधानतया पाँच अग्नियोंके सम्बन्धसे आहुतियोंका परिणाम ही बतलाना अभीष्ट है, यजमानोंकी गति नहीं; उसका तो श्रुति आगे चलकर धूमादिक्रमसे अविद्वानोंकी गतिका तथा विद्यासे प्राप्त होनेवाली विद्वानोंकी उत्तरमार्गीय गतिका वर्णन करेगी ॥२॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
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पञ्चम खण्ड
पर्जन्यरूप अग्निविद्या
| द्वितीयहोमपर्यायार्थमाह— | अब श्रुति द्वितीय होमके पर्यायार्थका वर्णन करती है— |
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पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादनयो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
| पर्जन्यो वाव पर्जन्य एव गौतमाग्निः पर्जन्यो नाम वृष्ट्युपकरणाभिमानी देवताविशेषः। तस्य वायुरेव समित्। वायुना हि पर्जन्योऽग्निः समिध्यते, पुरोवातादिप्राबल्ये वृष्टिदर्शना। अभ्रं धूमो धूमकार्यत्वाद् धूमवच्च लक्ष्यमाणत्वात्। विद्युदर्चिः, प्रकाशसामान्यात्। अशनिरङ्गाराः, काठिन्याद्विद्युत्सम्बन्धाद्वा। ह्रादनयो | हे गौतम ! 'पर्जन्यो वाव'-पर्जन्य ही अग्नि है—वृष्टिके जो साधन हैं उनके अभिमानी देवताविशेषका नाम 'पर्जन्य' है। उसका वायु ही समिध् है, क्योंकि पर्जन्यरूप अग्नि वायुसे ही प्रदीप्त होता है, जैसा कि पूर्वीय वायु आदिकी प्रबलता होनेपर वृष्टि होती देखी जानेसे सिद्ध होता है। धूमका कार्य होने तथा धूमवत् देखा जानेके कारण बादल धूम है। प्रकाशमें समानता होनेके कारण विद्युत् (बिजली) ज्वाला है। कठिनताके कारण अथवा विद्युत्से सम्बन्ध रखनेके कारण वज्र अङ्गार है। ह्रादनय विस्फुलिङ्ग |
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