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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

४७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

सन्पितुरर्धंस्थानमेयायागतवान्, तं च पितरमुवाच----अननुशिष्यानुशासनमकृत्वैव मा मां किल भगवान्समावर्तनकालेऽब्रवीदुक्तवाननु त्वाशिषमन्वशिषं त्वामिति ॥ ४ ॥पिताके अर्ध-स्थानपर आया और उस अपने पितासे बोला--'श्रीमान्-ने अनुशासन किये बिना ही समावर्तन संस्कारके समय मुझसे कह दिया था कि 'मैने तुझे शिक्षा दे दी है' ॥ ४ ॥
यतः--- ।क्योंकि—

पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकञ्चन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥

'उस क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे थे; किंतु मैं उनमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका।' उसने कहा--'तुमने उस समय (आते ही) जैसे ये प्रश्न मुझे सुनाये हैं उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता होता तो तुम्हें क्यों न बतलाता?' ॥५॥

पञ्च पञ्चसंख्याकान्प्रश्नान् राजन्यबन्धू राजन्या बन्धवोऽस्येति राजन्यबन्धुः स्वयं दुर्वृत्त इत्यर्थः । अप्राक्षीत्पृष्टवान्; तेषां प्रश्नानां नैकञ्चन एकमपि नाशकं न शक्तवानहं विवक्तुं विशेषेणार्थतो निर्णैतुमित्यर्थः ।'राजन्यबन्धुने--राजन्य (क्षत्रिय लोग) जिसके बन्धु हों उसे राजन्यबन्धु कहते हैं अर्थात् जो स्वयं दुराचारी है ऐसे उस राजन्यबन्धुने मुझसे पाँच--गिनतीके पाँच प्रश्न पूछे थे; किंतु मैं उन प्रश्नोंमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका; अर्थात् उनका विशेषरूपसे अर्थतः निर्णय नहीं कर सका।'
खण्ड ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७७

| स होवाच पिता--यथा मा मां वत्स त्वं तदागतमात्र एवैतान् प्रश्नानवद उक्तवानसि--तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति, तथा मां जानीहि, त्वदीयाज्ञानेन लिङ्गेन मम तद्विषयमज्ञानं जानीहीत्यर्थः । कथम् ? यथाहमेषां प्रश्नानामेकञ्चनैकमपि न वेद न जान इति; यथा त्वमेवाङ्गैतान् प्रश्नान्न जानीषे तथाहमप्येतान्न जान इत्यर्थः । अतो मय्यन्यथाभावो न कर्तव्यः । कुत एतदेवम् ? यतो न जाने; यद्यहमिमान्प्रश्नानवेदिष्यं विदितवानस्मि, कथं ते तुभ्यं प्रियाय पुत्राय समावर्तनकाले पुरा नावक्ष्यं नोक्तवानस्मि ? ॥ ५ ॥ | तब उस पिताने कहा--'हे वत्स ! तुमने उस समय आते ही जैसे ये प्रश्न मुझसे कहे हैं उनमेंसे मैं एकका भी विवेचन नहीं कर सकता । ऐसा ही तुम मुझे समझो; अर्थात् अपने अज्ञानरूप लिङ्गसे तुम उस विषयमें मेरा अज्ञान समझ लो; ऐसा क्यों ? क्योंकि इन प्रश्नोंमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता । तात्पर्य यह है कि हे तात ! जिस प्रकार तुम इन प्रश्नोंको नहीं जानते उसी प्रकार मैं भी नहीं जानता । अतः मेरे प्रति तुम्हें अन्यथाबुद्धि नहीं करनी चाहिये । किंतु यह बात ऐसी कैसे समझी जाय ? क्योंकि मैं इन्हें जानता नहीं हूँ; यदि मैं इन प्रश्नोंको जानता तो पहले समावर्तनसंस्कारके समय अपने प्रियपुत्र तुम्हारे प्रति क्यों न कहता !' ॥ ५ ॥ |


पिता-पुत्रका प्रवाहणके पास आना

इत्युक्त्वा--ऐसा कहकर--

स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तँहोवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति। स होवाच तवैव