छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| पद्मरागादिमणिविक्रये वणिजो विज्ञानाधिक्यात्फलाधिक्यम् । तस्माद्यदेव विद्यया विज्ञानेन युक्तः सन् करोति कर्म श्रद्धया श्रद्धावानश्च सन्नुपनिषदा योगेन युक्तश्चेत्यर्थः, तदेव कर्म वीर्यवत्तरमविद्वत्कर्मणोऽधिकफलं भवतीति । विद्वत्कर्मणो वीर्यवत्तरत्ववचनादविदुषोऽपि कर्म वीर्यवदेव भवतीत्यभिप्रायः ।<br><br>न चाविदुषः कर्मण्यनधिकारः । औषस्त्ये काण्डेऽविदुषामप्यार्त्विज्यदर्शनात् । रसतमाप्तिसमृद्धिगुणवदक्षरमित्येकमुपासनम्, मध्ये प्रयत्नान्तरादर्शनात् । अनेकैर्हि विशेषणैरनेकधोपास्यत्वात् खल्वेतस्यैव प्रकृतस्योद्गीथाख्यस्याक्षरस्यौपव्याख्यानं भवति ॥ १० ॥ | इन दोनोंमेंसे व्यापारीको पद्मरागादि मणियोंकी बिक्रीका अधिक ज्ञान होनेके कारण अधिक फल होता है । अतः विद्या अर्थात् विज्ञानसे युक्त होकर श्रद्धासे यानी श्रद्धालु होकर और उपनिषद् अर्थात् योगसे युक्त होकर जो कर्म करता है वही प्रबलतर होता है—अविद्वान्के कर्मसे अधिक फल देनेवाला होता है । विद्वान्का कर्म प्रबलतर बतलाया गया है, इससे यह अभिप्राय सूचित होता है कि अविद्वान्का भी कर्म प्रबल तो होता ही है ।<br><br>अविद्वान्का कर्ममें अधिकार न हो—ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि औषस्त्यकाण्डमें (इस अध्यायके दशम खण्डमें) अविद्वानोंको भी ऋत्विक्कर्म करते देखा जाता है । वह अक्षर रसतम् तथा आप्ति और समृद्धि गुणोंसे युक्त है—ऐसी एक उपासना है, क्योंकि इसका निरूपण करते समय बीचमें कोई और प्रयत्न नहीं देखा गया। अनेकों विशेषणों द्वारा अनेक प्रकारसे उपास्य होनेके कारण निश्चय ही यह सब इस उद्गीथसंज्ञक प्रकृत अक्षर (ॐ)की ही व्याख्या है॥ १० ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये प्रथम खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
प्राणोपासनाकी उत्कृष्टता सूचित करनेवाली आख्यायिका
देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे उभये प्राजापत्या-
स्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम
इति ॥ १ ॥
प्रसिद्ध है, [पूर्वकालमें] प्रजापतिके पुत्र देवता और असुर किसी कारणवश परस्पर युद्ध करने लगे। उनमेंसे देवताओंने यह सोचकर कि, इसके द्वारा इनका पराभव करेंगे, उद्गीथका अनुष्ठान किया ॥ १ ॥
| [आख्यायिकार्थनिर्वचनम्]<br>देवासुरा देवाश्चासुराश्च। देवा दीव्यतेर्द्योतनार्थस्य शास्त्रोद्भासिता इन्द्रियवृत्तयः। असुरास्तद्विपरीताः स्वेष्वेवासुषु विष्वग्विषयासु प्राणनक्रियासु रमणात्स्वाभाविक्यस्तमआत्मिका इन्द्रियवृत्तय एव। ह वा इति पूर्ववृत्तोद्भासकौ निपातौ। यत्र यस्मिन्निमित्त इतरेतरविषयापहारलक्षणे संये- | देवासुराः—देवता और असुरगण। 'देव' शब्द द्योतनार्थक 'दिव्' धातुसे सिद्ध हुआ है। इसका अभिप्राय शास्त्रालोकित इन्द्रियवृत्तियाँ हैं। तथा उसके विपरीत, जो अपने ही असुओं (प्राणों) में यानी विविध विषयोंमें जानेवाली प्राणनक्रियाओंमें (जीवनोपयोगी प्राणव्यापारोंमें) ही रमण करनेवाली होनेके कारण स्वभावसे ही तमोमयी इन्द्रियवृत्तियाँ हैं, वे ही 'असुर' कहलाती हैं। 'ह' और 'वै' ये पूर्ववृत्तान्तको सूचित करनेवाले निपात हैं। 'यत्र' जिस निमित्तसे अर्थात् एक-दूसरेके विषयोंके अप- |