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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| अभिसमेत्य मुख्यं प्राणं तमूचुः--हे भगवन्नेधि भव नः स्वामी, तस्मात्त्वं नोऽस्माकं श्रेष्ठोऽसि; मा चास्माद्देहादुत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ | मुख्यप्राणके सम्मुख जा उससे बोले--'हे भगवन् ! एधि'--'आप हमारे स्वामी हों, क्योंकि हम सबमें आप श्रेष्ठ हैं । तथा इस शरीरसे आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ ॥ |


इन्द्रियोंद्वारा प्राणकी स्तुति

अथ हैनँ वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनँ चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥१३॥ अथ हैनꣳ श्रोत्रमुवाच यदहꣳसंपदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैनँ मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥

फिर उससे वाक् इन्द्रियने कहा--'मैं जो वसिष्ठ हूँ सो तुम्हीं वसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा—'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ सो तुम्हीं प्रतिष्ठा हो' ॥१३॥ फिर उससे श्रोत्रने कहा—'मैं जो सम्पद् हूँ सो तुम्हीं सम्पद् हो ।' तत्पश्चात् उससे मन बोला—'मैं जो आयतन हूँ सो तुम्हीं आयतन हो' ॥ १४ ॥

अथ हैनँ वागादयः प्राणस्य श्रेष्ठत्वं कार्येणापादयन्त आहुर्बलिमिव हरन्तो राज्ञे विशः । कथम् ? वाक् तावदुवाच-यदहं वसिष्ठोऽस्मि, यदिति क्रियाविशेषणम्, यद्वसिष्ठत्वगुणास्मीत्य-तदनन्तर वैश्यलोग जिस प्रकार राजाको भेंट समर्पण करते हैं उसी प्रकार वागादि इन्द्रियोंने अपने कार्यसे प्राणकी श्रेष्ठता सम्पादन करते हुए कहा । किस प्रकार कहा ?--पहले वाणी बोली--मैं जो वसिष्ठ हूँ, यहाँ मूलमें 'यत' शब्द क्रिया-विशेषण है, अर्थात् 'मैं जो वसिष्ठत्व

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५३


र्थः; त्वं तद्वसिष्ठस्तेन वसिष्ठत्वगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसि तद्गुणस्त्वमित्यर्थः । अथवा तच्छब्दोऽपि क्रियाविशेषणमेव । त्वत्कृतस्त्वदीयोऽसौ वसिष्ठत्वगुणोऽज्ञानान्ममेति मयाभिमत इत्येतत् । तथोत्तरेषु योज्यं चक्षुःश्रोत्रमनःसु ॥१३-१४॥गुणवाली हूँ सो तुम वसिष्ठ हो—उस वसिष्ठत्व गुणसे तद्वसिष्ठ हो अर्थात् तुम्हीं उस गुणवाले हो।' अथवा 'सत्' शब्द भी क्रियाविशेषण ही है। तब इसका यह तात्पर्य होगा कि 'तुम्हारा किया हुआ अर्थात् तुम्हारा जो यह वसिष्ठत्व गुण है वह अज्ञानसे 'मेरा है' ऐसा मैंने समझ लिया है।' इसी प्रकार आगेके चक्षु, श्रोत्र और मनके विषयमें योजना कर लेनी चाहिये ॥ १३-१४ ॥

श्रुतेरिदं वचो युक्तमिदं वागादिभिर्मुख्यं प्राणं प्रत्यभिहितं यस्मात्—वाक् आदि इन्द्रियोंद्वारा मुख्य प्राणके प्रति कहा हुआ जो यह श्रुतिका वाक्य है सो ठीक ही है, क्योंकि—

न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥

[ लोकमें समस्त इन्द्रियोंको ] न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं; परंतु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण ही हैं ॥ १५ ॥

न वै लोके वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीति वागादीनि करणान्याचक्षते लौकिकालोकमें इन वाक् आदि [समस्त] इन्द्रियोंको लौकिक अथवा शास्त्रज्ञ पुरुष न तो वाक् कहते हैं और न