छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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वागिन्द्रियकी परीक्षा
| तथोक्तेषु पित्रा प्राणेषु— | प्राणोंके प्रति पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर— |
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सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥
उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके?' [उन्होंने कहा--] 'जिस प्रकार गूँगे लोग बिना बोले प्राणसे प्राणन-क्रिया करते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे]।' ऐसा सुनकर वाक् इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥
| सा ह वागुच्चक्रामोत्क्रान्तवती । सा चोत्क्रम्य संवत्सरमात्रं प्रोष्य स्वव्यापारान्निवृत्ता सती पुनः पर्येत्येतरान्प्राणानुवाच—कथं केन प्रकारेणाशकत शक्तवन्तो यूयं मद्ऋते मां विना जीवितुं धारयितुमात्मानमिति, ते होचुर्यथा कला इत्यादि । कला मूका यथा लोकेऽवदन्तो वाचा जीवन्ति । कथम् ? | उस वाक् इन्द्रियने उत्क्रमण किया। तथा उसने उत्क्रमण कर केवल एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर--अपने व्यापारसे निवृत्त रहकर फिर लौटकर अन्य प्राणोंसे कहा--'तुमलोग मेरे बिना कैसे किस प्रकारसे जीवित रह सके?' तब उन्होंने 'जिस प्रकार गूँगे' इत्यादि उत्तर दिया । जिस प्रकार 'कला:'-गूँगेलोग संसारमें वाणीसे बिना बोले भी जीवित रहते हैं—किस प्रकार ?—प्राणसे प्राणन |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९
| प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवं सर्वकरणचेष्टां कुर्वन्त इत्यर्थः, एवं वयमजीविष्वेत्यर्थः । आत्मनोऽश्रेष्ठतां प्राणेषु बुद्ध्वा प्रविवेश ह वाक्पुनः स्वव्यापारे प्रवृत्ता बभूवेत्यर्थः ॥ ८ ॥ | करते हुए, नेत्रसे देखते हुए, कानसे सुनते हुए और मनसे चिन्तन करते हुए, तात्पर्य यह है कि इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंकी चेष्टाएँ करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार हम भी जीवित रहे। तब प्राणोंमें अपनी अश्रेष्ठता समझकर वाक् इन्द्रियने प्रवेश किया; अर्थात् वह पुनः अपने व्यापारमें प्रवृत्त हो गयी ॥ ८ ॥ |
चक्षुकी परीक्षा
चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥
[ फिर ] चक्षुने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार अन्धे लोग बिना देखे प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] । ऐसा सुनकर चक्षुने प्रवेश किया ॥ ९ ॥
श्रोत्रकी परीक्षा
श्रोत्र꣫ होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा बधिरा अशृण्वन्त