छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| पादयिष्यति सुहय इत्यादिभि- | श्रेष्ठताका तो 'सुहयः' इत्यादि |
| दर्शनेन । अतः प्राण एव | दृष्टान्तद्वारा [ बारहवें मन्त्रमें ] |
| ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चास्मिन्कार्यकरण- | प्रतिपादन किया जायगा । अतः |
| संघाते ॥ १ ॥ | इस कार्यकारणसंघातमें प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ |
यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥
जो कोई वसिष्ठको जानता है वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है; निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है ॥ २ ॥
| यो ह वै वसिष्ठं वसितृ तम- | जो कोई वसिष्ठ—अत्यन्त |
| माच्छादयितृतमं वसुत्तमं वा | बसनेवाले अर्थात् आच्छादन करने- |
| यो वेद स तथैव वसिष्ठो ह | वालेको अथवा अत्यन्त वसुमान् |
| भवति स्वानां ज्ञातीनाम् । | (धनवान्) को जानता है वह |
| कस्तर्हि वसिष्ठः ? इत्याह— | उसी प्रकार अपने सजातियोंमें |
| वाग्वाव वसिष्ठः, वाग्मिनो हि | वसिष्ठ होता है। अच्छा तो वसिष्ठ |
| पुरुषा वसन्त्यभिभवन्त्यन्यान्य- | कौन है ? इसपर श्रुति कहती है— |
| सुमत्त्तमाश्च, अतो वाग्वसिष्ठः | निश्चय ही वाक् वसिष्ठ है; क्योंकि |
| ॥ २ ॥ | वाग्मी (श्रेष्ठ वक्ता) लोग ही बसते |
| | अर्थात् दूसरोंका पराभव करते हैं; |
| | और अधिक धनवान् भी होते हैं; |
| | अतः वाक् ही वसिष्ठ है ॥ २ ॥ |
यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥
जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है; चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४५
| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद स अस्मिँल्लोकेऽमुष्मिंश्च परे प्रतितिष्ठति ह । का तर्हि प्रतिष्ठा ? इत्याह—चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा । चक्षुषा हि पश्यन्समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति यस्मात्, अतः प्रतिष्ठा चक्षुः ॥ ३ ॥ | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है । अच्छा तो प्रतिष्ठा क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—चक्षु ही प्रतिष्ठा है, क्योंकि चक्षुसे देखकर ही पुरुष सम और विषम प्रदेशमें स्थित होता है; इसलिये चक्षु ही प्रतिष्ठा है ॥३॥ |
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यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत् ॥ ४ ॥
जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष काम ( भोग ) सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । श्रोत ही सम्पद् है ॥ ४ ॥
| यो ह वै संपदं वेद तस्मा अस्मै दैवाश्च मानुषाश्च कामाः संपद्यन्ते ह । का तर्हि संपद् ? इत्याह—श्रोत्रं वाव संपत् । यस्माच्छ्रोत्रेण वेदा गृह्यन्ते तदर्थविज्ञानं च, ततः कर्माणि क्रियन्ते, ततः कामसंपत् । इत्येवं कामसंपद्धेतुत्वाच्छ्रोत्रं वा संपत् ॥ ४ ॥ | जो कोई सम्पद्को जानता है उसे दैव और मानुष भोग सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं । अच्छा तो सम्पद् क्या है ? इसपर श्रुति कहती है—श्रोत्र ही सम्पद् है, क्योंकि श्रोत्रसे वेद और उनके अथका विशेष ज्ञान ग्रहण किये जाते हैं, फिर कर्म किये जाते हैं और तदनन्तर भोगोंकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार भोगोंकी प्राप्तिके हेतु होनेके कारण श्रोत्र ही सम्पद् हैं ॥ ४ ॥ |
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यो ह वा आयतनं वेदायतनँह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥