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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४३२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| कथमिव ? इत्याह—स यथैकपात्पुरुषो व्रजन्गच्छन्नध्वानं रिष्यति, रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो गच्छन्निरिष्यति, एवमस्य यजमानस्य कुब्रह्मणा यज्ञो रिष्यति विनश्यति । यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति; यज्ञप्राणो हि यजमानः, अतो युक्तो यज्ञरेषे रेषस्तस्य । स तं यज्ञमिष्ट्वा तादृशं पापीयान्पापतरो भवति ॥ २-३ ॥ | किस प्रकार नष्ट हो जाता है ? यह श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार मार्गमें एक पाँवसे चलनेवाला मनुष्य गिर जाता है अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नाशको प्राप्त होता है उसी प्रकार कुत्सित ब्रह्माके द्वारा इस यजमानका यज्ञ नष्ट हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका भी नाश होता है, क्योंकि यजमानका तो यज्ञ ही प्राण है, इसलिये यज्ञके नाश होनेपर उसका नाश होना उचित ही है। वह इस प्रकारके उस यज्ञका यजन करनेपर पापीयान्—अधिकतर पापी होता है ॥ २-३ ॥ |

ब्रह्माके मौनपालनसे यज्ञकी प्रतिष्ठा

अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ स यथोभयपाद्व्रजन्नरथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥

और यदि प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेके अनन्तर परिधानीया ऋचासे पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलता है तो [ समस्त ऋत्विक् मिलकर ] दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं । तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता । जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चलनेवाला पुरुष अथवा दोनों पहियोंसे चलने-

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३३


वाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार इसका यज्ञ स्थित रहता है, यज्ञके स्थित रहनेपर यजमान भी स्थित रहता है। वह [ऐसा] यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥

| अथ पुनर्यत्र ब्रह्मा विद्वान्मौनं परिगृह्य वाग्विसर्गमकुर्वन्वर्तते यावत्परिधानीयाया न व्यववदति तथैव सर्वर्त्विज उभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरापि। किमिव ? इत्याह पूर्वोक्तविपरीतौ दृष्टान्तौ। एवमस्य यजमानस्य यज्ञः स्ववर्तनीभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठति स्वेनात्मनाविनश्यन्वर्तत इत्यर्थः। यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति। स यजमान एवं मौनविज्ञानवद्ब्रह्मोपेतं यज्ञमिष्ट्वा श्रेयानम्भवति श्रेष्ठो भवतीत्यर्थः ॥४-५॥ | किन्तु जहाँ विद्वान् ब्रह्मा मौन ग्रहण करनेके अनन्तर परिधानीया ऋचापर्यन्त वाणी उच्चारण न करता हुआ रहता है, मौन त्याग नहीं करता; और उसीकी तरह अन्य सब ऋत्विक् भी [नियमबद्ध] रहते हैं, वहाँ वे सब दोनों ही मार्गोंका संस्कार कर देते हैं। तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता। किस प्रकार नष्ट नहीं होता, इसमें श्रुति पहलेसे विपरीत दृष्टान्त देती है। तात्पर्य यह है कि उसी प्रकार अपने दोनों मार्गोंद्वारा स्थित हुआ इस यजमानका यज्ञ प्रतिष्ठित होता है, अर्थात् अपने स्वरूपसे भ्रष्ट न होता हुआ वर्तमान रहता है। यज्ञके प्रतिष्ठित रहनेपर यजमान भी उसीकी तरह प्रतिष्ठित रहता है। इस प्रकारके मौन-विज्ञानयुक्त ब्रह्मावाला वह यजमान यज्ञ करके श्रेयान् होता है अर्थात् श्रेष्ठ होता है ॥ ४-५ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

सप्तदश खण्ड

यज्ञ-दोषके प्रायश्चित्तरूपसे व्याहृतियोंकी उपासना

अत्र ब्रह्मणो मौनं विहितम्; तद्रेषे ब्रह्मत्वकर्मणि चाथान्यस्मिंश्च हौत्रादिकर्मरेषे व्याहृतिहोमः प्रायश्चित्तमिति तदर्थं व्याहृतयो विधातव्या इत्याह-यहाँ ब्रह्माके मौनका विधान किया गया, उसका भ्रंश होनेपर ब्रह्मत्व कर्मका विनाश होने अथवा अन्य किसी हौत्रादि कर्मका विनाश होनेपर व्याहृतिहोम यह प्रायश्चित्त है; उसके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है, इसलिये श्रुति कहती है-

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानाँ रसान् प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १॥

प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया। उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको उद्धृत किया ॥ १ ॥

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपल्लोकानुद्दिश्य तत्र सारजिघृक्षया ध्यानलक्षणं तपश्चकार। तेषां तप्यमानानां लोकानां रसान्साररूपान्प्रावृहदुद्धृतवाञ्जग्राहेत्यर्थः।<br><br>कान् ? अग्निं रसं पृथिव्याः,प्रजापतिने लोकोंको अर्थात् लोकोंको लक्ष्य बनाकर उनसे सार ग्रहण करने की इच्छासे ध्यानरूप तप किया। इस प्रकार तप किये जाते हुए उन लोकोंके साररूप रसोंको 'प्रावृहत्' — उद्धृत अर्थात् ग्रहण किया। किन रसोंको ग्रहण किया ? पृथिवीसे अग्निरूप रस

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४३५


| वायुमन्तरिक्षात्, आदित्यं दिवः ॥ १ ॥ | अन्तरिक्षसे वायुरूप रस और द्युलोक-से आदित्यरूप रस ग्रहण किया ॥ १ ॥ |


स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानाँ रसान्प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥

[ फिर ] उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये ॥ २ ॥

| पुनरप्येवमेवाग्न्याद्याः स एतास्तिस्रो देवता उद्दिश्याभ्यतपत् । ततोऽपि सारं रसं त्रयी-विद्यां जग्राह ॥ २ ॥ | फिर भी उसी प्रकार उसने अग्नि आदि तीन देवताओंको लक्ष्य बनाकर तप किया । उनसे भी त्रयी-विद्यारूप सार—रस ग्रहण किया ॥ २ ॥ |

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स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ तद्यदृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टँ संदधाति ॥ ४ ॥

[ तदनन्तर ] उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक् श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन रसोंको ग्रहण किया । उस यज्ञमें यदि ऋक श्रुतियोंके सम्बन्धसे क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ॥ ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतको पूर्ति करता है ॥ ३-४ ॥