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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४२२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

एतँसंयद्वाम इत्याचक्षत एतँहि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥२॥

इसे 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे इसे ही प्राप्त होती हैं; जो इस प्रकार जानता है उसे सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे प्राप्त होती हैं ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतं यथोक्तं पुरुषं संयद्वाम इत्याचक्षते। कस्मात्? यस्मादेतं सर्वाणि वामानि वननीयानि संभजनीयानि शोभनान्यभिसंयन्त्यभिसंगच्छन्तीत्यतः संयद्वामः। तथैवंविदमेनं सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥ २ ॥इस पूर्वोक्त पुरुषको 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं। क्यों? क्योंकि सम्पूर्ण वाम—वननीय-सम्भजनीय अर्थात् शोभन पदार्थ सब ओरसे इसे ही प्राप्त होते हैं, इसलिये यह संयद्वाम है। इसी प्रकार ऐसा जाननेवाले पुरुषको—जो इसे ऐसा जानता है उसे, सम्पूर्ण सेवनीय पदार्थ सब ओरसे प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
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एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥ ३ ॥

यही वामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण वामोंका वहन करता है। जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण वामोंको वहन करता है ॥ ३ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एष उ एव वामनीर्यस्मादेष हि सर्वाणि वामानि पुण्यकर्मफलानि पुण्यानुरूपं प्राणिभ्यो नयति प्रापयति वहति चात्मधर्मत्वेन। विदुषः फलं सर्वाणियही वामनी है, क्योंकि यही अपने धर्मरूपसे प्राणियोंके प्रति उनके पुण्यानुसार सम्पूर्ण वाम—पुण्य कर्मफलोंका वहन करता है। इसके विद्वान्को मिलनेवाला फल—जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२३
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वामानि नयति य एवं वेद ॥३॥वामोंका (पुण्यकर्मफलोंका) वहन करता है ॥ ३ ॥

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एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥

यही भामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है। जो ऐसा जानता है वह सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है ॥ ४ ॥

एष उ एव भामनीरेष हि यस्मात्सर्वेषु लोकेष्वादित्यचन्द्राग्न्यादिरूपैर्भाति दीप्यते । “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” (क० उ० ५।१६) इति श्रुतेः; अतो भामानि नयतीति भामनीः । य एवं वेदासावपि सर्वेषु लोकेषु भाति ॥ ४ ॥यही भामनी है, क्योंकि सम्पूर्ण लोकोंमें आदित्य, चन्द्र और अग्नि आदिके रूपोंमें यही भासमान—दीप्त होता है। “उसीके प्रकाशसे यह सब प्रकाशित है” इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता है। अतः भामों (प्रकाशों) का वहन करता है इसलिये भामनी है। जो ऐसा जानता है वह भी सम्पूर्ण लोकमें भासमान होता है ॥ ४ ॥

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ब्रह्मवेत्ताकी गति

अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान्यासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ५ ॥