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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
सर्वर्क्सामावरोधे चर्क्सामसाध्यानां सर्वकर्मणामवरोधः कृतः स्यात्। तदवरोधे च सर्वे कामा अवरुद्धाः स्युः। ओमित्येतदक्षरमुद्गीथ इति भक्त्याशङ्का निवर्त्यते।<br><br>तद्वा एतदिति मिथुनं निर्दिश्यते किं तन्मिथुनम्? इत्याह—<br><br>यद्वाक्च प्राणश्च सर्वर्क्सामकारणभूतौ मिथुनम्। ऋक्च साम चेति ऋक्सामकारणावृक्सामशब्दोक्तावित्यर्थः। न तु स्वातन्त्र्येण ऋक्च साम च मिथुनम्। अन्यथा हि वाक्च प्राणश्चेत्येकं मिथुनमृक्साम चापरं मिथुनमिति द्वे मिथुने स्याताम्। तथा चतद्वैतन्मिथुनमित्येकवचननिर्देशोऽनुपपन्नः स्यात्। तस्मादृक्सामयोन्योर्वाक्प्राणयोरेव मिथुनत्वम्॥ ५ ॥सम्पूर्ण ऋक् और सम्पूर्ण सामका अन्तर्भाव होनेपर ऋक् और सामसे सिद्ध होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंका अन्तर्भाव हो जाता है, और उनका अन्तर्भाव होनेपर समस्त कामनाएँ उनके अन्तर्भूत हो जाती हैं।※<br><br>'उद्गीथ' शब्दसे सम्पूर्ण उद्गीथ-भक्ति न ले ली जाय, इस आशङ्काको 'ओम्' यह अक्षर ही उद्गीथ है' ऐसा कहकर निवृत्त किया जाता है।<br><br>'तद्वा एतत्' इत्यादि वाक्यसे मिथुनका निर्देश किया जाता है। वह मिथुन कौन है? यह बतलाते हैं यह जो सम्पूर्ण ऋक् और सामके कारणभूत वाक् और प्राण हैं मिथुन हैं। 'ऋक् च साम च' इसमें ऋक् और सामके कारण ही ऋक् और साम शब्दोंसे कहे गये हैं। ऋक् और साम स्वतन्त्रतासे मिथुन नहीं हैं; नहीं तो वाक् और प्राण यह एक मिथुन तथा ऋक् और साम-यह दूसरा मिथुन इस प्रकार दो मिथुन होते; और ऐसा होनेपर 'तद्वा एतन्मिथुनम्' इस वाक्यमें जो एकवचनका निर्देश किया गया है, वह असंगत हो जाता। अतः ऋक् और सामके कारणभूत वाक् और प्राण ही मिथुन हैं॥ ५ ॥

※ इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिका कारण होनेवाला ओंकार व्याप्तिगुणविशिष्ट है—यह सिद्ध होता है।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३९


ॐ.. में संसृष्ट मिथुनके समागमका फल

तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् ॥ ६ ॥

वह यह मिथुन ॐ इस अक्षरमें संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुनके अवयव) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक-दूसरेकी कामनाओंको प्राप्त करानेवाले होते हैं ॥ ६ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तदेतदेवंलक्षणं मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते । एवं सर्वकामावाप्तिगुणविशिष्टं मिथुनमोंकारे संसृष्टं विद्यत इत्योंकारस्य सर्वकामावाप्तिगुणवत्त्वं प्रसिद्धम् । वाङ्मयत्वमोंकारस्य प्राणनिष्पाद्यत्वं च मिथुनेन संसृष्टत्वम् ।वह यह ऐसे लक्षणवाला मिथुन ॐ इस अक्षरमें संयुक्त होता है । इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त मिथुन ओंकारमें संयुक्त रहता है, इसलिये ओंकारका सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त होना सिद्ध होता है । ओंकार वाङ्मय है और प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है—यही उसका मिथुनसे संयुक्त होना है ।
मिथुनस्य कामापयितृत्वं प्रसिद्धमिति दृष्टान्त उच्यते-यथा लोके मिथुनौ मिथुनावयवौ स्त्रीपुंसौ यदा समागच्छतो ग्राम्यधर्मतया संयुज्येयातां तदापयतः प्रापयतोऽन्योन्यस्येतरेतरस्य तौ कामम् । तथा च स्वात्मानुप्रविष्टेन मिथुनेन सर्वकामाप्ति-कामनाओंको प्राप्ति करा देना यह मिथुनका प्रसिद्ध धर्म है—इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है—जिस प्रकार लोकमें मिथुन यानी मिथुनके अवयवभूत स्त्री और पुरुष परस्पर मिलते हैं—ग्राम्यव्यवहार(रति) के लिये आपसमें संसर्ग करते हैं, उस समय वे एक दूसरेकी कामना पूर्ण कर देते हैं । इसी प्रकार अपनेसे अनुप्रविष्ट मिथुनके द्वारा ओंकारका