छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
३७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| एवं द्वावन्यावेकाङ्काय एवमेकोऽन्य इति । एवं दश सन्तस्तत्कृतं भवति । | अन्न हैं तथा जिस प्रकार एक अङ्कवाला पासा होता है उसी प्रकार इनसे भिन्न [ वायु और प्राण --ये अन्नादी ] हैं । इस प्रकार [ ४, ३, २, १ ] ये सब मिलकर दश होनेके कारण ही कृत हैं। |
| यत एवम्, तस्मात्सर्वासु दिक्षु दशस्वप्यग्न्याद्या वागाद्याश्च दशसंख्यासामान्यादन्नमेव । "दशाक्षरा विराट्" "विराडन्नम्" इति हि श्रुतिः । अतोऽन्नमेव दशसंख्यत्वात् । तत एव दश कृतं कृतेऽन्तर्भावाच्चतुरङ्कत्वेनेत्यवोचाम । सैषा विराड् दशसंख्या सत्यन्नं चान्नादी-अन्नादिनी च कृतत्वेन । कृते हि दशसंख्यान्तर्भूतातोऽन्नमन्नादिनी च सा । | क्योंकि ऐसा है, इसलिये सम्पूर्ण यानी दशों दिशाओंमें अग्न्यादि और वागादि—ये दश संख्यामें समान होनेके कारण अन्न ही हैं । "विराट् दश अक्षरोंवाला है" "विराट् अन्न है" ऐसी श्रुति भी है । अतः दश संख्यावाले होनेके कारण ये [ अग्न्यादि और वागादि ] अन्न ही हैं । इसीलिये ये दश कृत ही हैं, क्योंकि चार अङ्कवाला होनेसे कृतनामक पासेमें सब पासोंका अन्तर्भाव हो जाता है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं । वह यह विराट् देवता दश संख्यावाली होती हुई अन्न और अन्नादी—अन्नादिनी अर्थात अन्न भक्षण करनेवाली है, क्योंकि वह कृतरूपा है । कृतमें दश संख्याका अन्तर्भाव है, इसलिये यह अन्न और अन्नादिनी है । |
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९
| तथा विद्वान्दशदेवतात्मभूतः संवर्गविद्यायाः सन्विराट्त्वेन दशसर्वोपलब्धि-संख्यान्नं कृतफलत्वम् संख्ययान्नादी च । तथात्रान्नादित्येदं सर्वं जगद्दशदिक्संस्थं दृष्टं कृतसंख्याभूतयोपलब्धम् । एवंविदोऽस्य सर्वं कृतसंख्याभूतस्य दशदिक्संबद्धं दृष्टमुपलब्धं भवति । किञ्चान्नादश्च भवति य एवं वेद यथोक्तदर्शी । द्विरभ्यास उपासनसमाप्त्यर्थः ॥ ८ ॥ | इस प्रकार जाननेवाला उपासक दश देवताओंसे तादात्म्य प्राप्त कर दश संख्याके कारण विराट्रूपसे अन्न और कृतरूपसे अन्नादी हो जाता है । इस प्रकार कृतसंख्याभूत उस अन्न और अन्नादिनीद्वारा दशों दिशाओंसे सम्बद्ध यह सारा जगत् दृष्ट अर्थात् उपलब्ध कर लिया गया है । इस प्रकार जाननेवाले कृतसंख्याभूत इस विद्वान्को दशों दिशाओंसे सम्बद्ध सब कुछ दृष्ट यानी उपलब्ध हो जाता है । तथा पूर्वोक्तदृष्टिवाला जो उपासक इस प्रकार जानता है वह अन्नाद [दीप्ताग्नि] भी होता है । 'य एवं वेद य एवं वेद' यह द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ८ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
</div>चतुर्थ खण्ड
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सत्यकामका ब्रह्मचर्य-पालन और वनमें जाकर गो चराना
| सर्वं वागाद्यग्न्यादि चान्नान्नादत्वसंस्तुतं जगदेकीकृत्य षोडशधा प्रविभज्य तस्मिन्ब्रह्मदृष्टिर्विधातव्येत्यारभ्यते। श्रद्धा-तपसोर्ब्रह्मोपासनाङ्गत्वप्रदर्शनायाख्यायिका। | अन्न और अन्नादरूपसे भली प्रकार स्तुत हुए वागादि और अग्न्यादिरूप सम्पूर्ण जगत्को कारणरूपसे एक कर फिर उसके सोलह-विभाग कर उसमें ब्रह्मदृष्टिका विधान करना है; इसीके लिये अब आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है वह श्रद्धा और तपका ब्रह्मोपासनाका अङ्गत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |
सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥
जबालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जबालाको सम्बोधित करके निवेदन किया—'हे पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक [ गुरुकुलमें ] निवास करना चाहता हूँ; [ बता ] मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १ ॥
| सत्यकामो ह नामतः, हशब्द ऐतिह्यार्थः, जबालाया अपत्यं जाबालो जबालां स्वां मातरमामन्त्रयाञ्चक्र आमन्त्रितवान् । ब्रह्मचर्यं स्वाध्यायग्रहणाय हे भवति विवत्स्याम्याचार्यकुले | 'ह' शब्द इतिहासका द्योतक है। जबालाके पुत्रने, जो नामसे सत्यकाम था, अपनी माता जबालाको आमन्त्रित—सम्बोधित [ करके निवेदन] किया—'हे पूजनीये ! मैं स्वाध्यायग्रहणके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक आचार्यकुलमें निवास करूँगा। |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१
| किंगोत्रोऽहं किमस्य मम गोत्रं सोऽहं किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १। | मैं किंगोत्र हूँ ? मेरा क्या गोत्र है ? अर्थात् मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १॥ |
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| एवं पृष्टा— | इस प्रकार पूछी जानेपर— |
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सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २॥
उसने उससे कहा—'हे तात ! तू जिस गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी । [परिचर्यामें संलग्न होनेसे गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं था ] उन्हीं दिनों युवावस्था में जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी पूछ न सकी ] इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अतः तू अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना' ॥ २ ॥
| जबाला सा हैन पुत्रमुवाच— नाहमेतत्तव गोत्रं वेद, हे तात यद्गोत्रस्त्वमसि । कस्मान्न वेत्सि ? इत्युक्ताह-बहु भर्तृगृहे परिचर्याजातमतिथ्यभ्यागतादि चरन्त्यहं परिचारिणी. परिचरन्तीति परिचरणशीलैवाहम्, परिचरणचित्ततया गोत्रादिस्मरणे मम मनो | उस जबालाने अपने उस पुत्रसे कहा—'हे तात ! जिस गोत्रवाला तू है मैं इस तेरे गोत्रको नहीं जानती।' क्यों नहीं जानती ?--इस प्रकार कही जानेपर वह बोली—पतिके घरमें अतिथि और अभ्यागतादिकोंकी बहुत टहल करनेवाली मैं परिचारिणी—परिचर्या करनेवाली अर्थात् शुश्रूषापरायण थी । इस प्रकार परिचर्यामें चित्त लगा रहनेके कारण गोत्रादिको याद रखनेमें मेरा |
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