छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| आगच्छामह आगता इति वा । त इह व्याघ्र इत्यादि समानमन्यत् । दृष्टं लोके जले वीचितरङ्गफेनबुद्बुदादय उत्थिताः पुनस्तद्भावं गता विनष्टा इति । जीवास्तु तत्कारणभावं प्रत्यहं गच्छन्तोऽपि सुषुप्ते मरणप्रलययोश्च न विनश्यन्तीत्येतद् । भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु दृष्टान्तेन । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ २-३ ॥ | लौटनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्के पाससे आयी हैं । 'ते इह व्याघ्रः' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । [श्वेतकेतु बोला—] लोकमें यह देखा गया है कि जलमें उठे हुए भँवर, तरंग, फेन एवं बुद्बुद आदि पुनः जलरूप हो जानेपर नष्ट हो जाते हैं; किंतु जीव तो प्रतिदिन सुषुप्तावस्थामें तथा मरण और प्रलयके समय अपने कारणभावको प्राप्त होकर भी नष्ट नहीं होते—सो हे भगवन् ! इस बातको मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ २-३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
एकादश खण्ड
—: o :—
वृक्षके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| शृणु दृष्टान्तमस्य— | [ इस विषयमें ] एक दृष्टान्त सुनो— |
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अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्या-
जीवन्स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याजीवन्स्रवेद्याऽग्रेऽभ्याह-
न्याजीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो
मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! यदि कोई इस महान् वृक्षके मूलमें आघात करे तो यह जीवित रहते हुए ही केवल रसस्राव करेगा, यदि मध्यमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए केवल रसस्राव करेगा और यदि इसके अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही रसस्राव करेगा । यह वृक्ष जीव—आत्मासे ओतप्रोत है और जलपान करता हुआ आनन्दपूर्वक स्थित है ॥ १ ॥
| संस्कृत व्याख्या | हिन्दी अनुवाद |
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| हे सोम्य महतोऽनेकशाखा-दियुक्तस्य वृक्षस्यास्येत्यग्रतः स्थितं वृक्षं दर्शयन्नाह—यदि यः कश्चिदस्य मूलेऽभ्याहन्यात्परश्वादिना सकृद्घातमात्रेण न शुष्यतीति जीवन्नेव भवति तदा तस्य रसः स्रवेत् । तथा यो | हे सोम्य ! [इस प्रकार सम्बोधित करके] सामने स्थित वृक्षको दिखलाते हुए कहते हैं—इस महान्—अनेक शाखादिसे युक्त वृक्षके मूलमें यदि कोई कुल्हाड़ी आदिसे आघात करे तो एक ही आघातसे यह सूख नहीं जाता, बल्कि जीवित ही रहता है; उस समय केवल इसका कुछ रस निकल जाता है । तथा यदि कोई मध्यमें आघात करे तो भी यह |