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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| त्मनि गवादिशब्दवन्निरूढत्वात् । अतस्तत्त्वमसीति हे श्वेतकेतो । <br><br> इत्येवं प्रत्यायितः पुत्र आह भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु यद्भवदुक्तं तत्संदिग्धं ममाहन्यहनि सर्वाः प्रजाः सुषुप्ते सत्संपद्यन्त इत्येतद्येन सत्सम्पद्य न विदुः सत्सम्पन्ना वयमिति । अतो दृष्टान्तेन मां प्रत्यायत्वित्यर्थः । एवमुक्तस्तथास्तु सोम्येति होवाच पिता ॥ ७ ॥ | हैं उसी प्रकार उपपदरहित 'आत्मा शब्द प्रत्यगात्मामें रूढ है । अतः हे श्वेतकेतो ! वह् सत् तू है । <br><br> इस प्रकार प्रतीति कराये हुए पुत्रने फिर कहा—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये । आपने जो कहा है उससे अभी मुझे संदेह ही है—सम्पूर्ण प्रजा रोज-रोज सुषुप्तिमें सत्को प्राप्त होती है; अतः इस विषयमें मुझे संदेह ही है कि वह यह कैसे नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो गये हैं । इसलिये तात्पर्य यह है कि आप मुझे दृष्टान्त देकर समझाइये' इस प्रकार कहे जानेपर पिताने 'सौम्य ! अच्छा' ऐसा कहा ॥ ७ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥

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नवम खण्ड

सुषुप्तिमें 'सत्'की प्राप्तिका ज्ञान न होनेमें मधुमक्खियोंका दृष्टान्त

यत्पृच्छस्यहन्यहनि सत्सम्पद्य <br><br> न विदुः सत्सम्पन्नाः स्म इति <br><br> तत्कस्मादित्यत्र शृणु दृष्टान्तम्—तू जो पूछता है कि प्रजा जो प्रतिदिन सत्‌को प्राप्त होकर भी यह नहीं जानती कि हम सत्‌को प्राप्त हो गये हैं, सो उसका यह अज्ञान किस कारणसे है ?—इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर—

यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणाँरसान्समवहारमेकताँरसं गमयन्ति ॥ १ ॥

हे सोम्य ! जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु निष्पन्न (तैयार) करती हैं तो नाना दिशाओंके वृक्षोंका रस लाकर एकताको प्राप्त करा देती हैं ॥१॥

यथा लोके हे सोम्य मधुकृतो मधु कुर्वन्तीति मधुकृतो मधुकरमक्षिका मधु निस्तिष्ठन्ति मधु निष्पादयन्ति तत्पराः सन्तः । कथम् ? नानात्ययानां नानागतीनां नानादिक्कानां वृक्षाणां रसान्समवहारं समाहृत्यैकतामेकभावं मधुत्वेन रसान्गमयन्ति मधुत्वमापादयन्ति ॥ १ ॥हे सोम्य ! जिस प्रकार लोकमें मधुकृत--मधु करती हैं इसलिये जो मधुकृत कही जाती हैं। वे मधुमक्खियाँ तत्पर होकर मधु तैयार करती हैं । किस प्रकार तैयार करती हैं ? नानात्यय नाना गतियोंवाले ( नाना प्रकारके ) विविध दिशाओंमें स्थित वृक्षोंके रस लाकर उन रसोंको मधुरूपसे एकताको प्राप्त करा देती हैं अर्थात् मधुत्वको प्राप्त करा देती हैं ॥ १ ॥
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