छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मध्यं स्वप्नान्तं सुषुप्तमित्येतत् ।<br><br>अथवा स्वप्नान्तं स्वप्नसत्तत्त्वमित्यर्थः । तत्राप्यर्थात्सुषुप्तमेव भवति; स्वमपीतो भवतीति वचनात् । न ह्यन्यत्र सुषुप्तात्स्वमपीतिं जीवस्येच्छन्ति ब्रह्मविदः । | रहती है उस] स्वप्नका नाम है; उसके मध्यको स्वप्नान्त अर्थात् सुषुप्त कहते हैं। अथवा 'स्वप्नान्त' इस शब्दका तात्पर्य 'स्वप्नका तत्त्व' ऐसा भी हो सकता है। ऐसा माननेपर भी अर्थतः सुषुप्त ही सिद्ध होता है; क्योंकि 'स्वमपीतो भवति' (अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है) ऐसा श्रुतिका वाक्य है; ब्रह्मवेत्तालोग सुषुप्तावस्थाको छोड़कर और किसी दशामें जीवकी स्वरूपप्राप्ति स्वीकार नहीं करते। |
| तत्र ह्यादर्शापनयने पुरुषप्रतिबिम्ब आदर्शगतो यथा स्वमेव पुरुषमपीतो भवत्येवं मनआद्युपरमे चैतन्यप्रतिबिम्बरूपेण जीवेनात्मना मनसि प्रविष्टा नामरूपव्याकरणाय परा देवता सा स्वमेवात्मानं प्रतिपद्यते जीवरूपतां मनआख्यां हित्वा । अतः सुषुप्त एव स्वप्नान्तशब्दवाच्य इत्यवगम्यते । | जिस प्रकार दर्पणको हटा लेनेपर दर्पणमें स्थित पुरुषका प्रतिबिम्ब स्वयं पुरुषको ही प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार उस सुषुप्तावस्थामें ही मन आदिकी निवृत्ति हो जानेपर चैतन्यके प्रतिबिम्बरूपसे जीवात्मभावसे नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये मनमें प्रविष्ट हुआ वह परदेवता मनसंज्ञक जीवरूपताको त्यागकर स्वयं अपने स्वरूपको ही प्राप्त हो जाता है। अतः इससे यह विदित होता है कि 'स्वप्नान्त' शब्दका वाच्य 'सुषुप्त' ही है। |
| यत्र तु सुप्तः स्वप्नान्पश्यति तत्स्वाप्नं दर्शनं सुखदुःखसंयुक्त- | किंतु जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष स्वप्न देखता है वह स्वप्नदर्शन सुख-दुःखसे युक्त होता |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| मिति पुण्यापुण्यकार्यम्। पुण्यापुण्ययोर्हि सुखदुःखारम्भकत्वं प्रसिद्धम्। पुण्यापुण्ययोश्चाविद्याकामोपष्टम्भेनैव सुखदुःखतद्दर्शनकार्यारम्भकत्वमुपपद्यते नान्यथेत्यविद्याकामकर्मभिः संसारहेतुभिः संयुक्त एव स्वप्न इति न स्वमपीतो भवति “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य भवति” (बृ० उ० ४।३।२२) “तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दाः” (बृ० उ० ४।३।२१) “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्यादिश्रुतिभ्यः। सुषुप्त एव स्वं देवतारूपं जीवत्वविनिर्मुक्तं दर्शयिष्यामीत्याह— स्वप्नान्तं मे मम निगदतो हे सोम्य विजानीहि विस्पष्टमवधारयेत्यर्थः। | है; इसलिये वह पुण्य-पापका कार्य है, क्योंकि पुण्य-पाप ही क्रमशः सुख-दुःखके आरम्भक रूपमें प्रसिद्ध हैं। किंतु पुण्य-पापका जो सुख, दुःख और उनके दर्शनरूप कार्यका आरम्भकत्व है वह अविद्या और कामनाके आश्रयसे ही सम्भव है, और किसी प्रकार नहीं, इसलिये स्वप्न संसारके हेतुभूत अविद्या, कामना और कर्म इनसे संयुक्त ही है; अतः उस अवस्थामें जीव अपने स्वरूपको प्राप्त नहीं होता; जैसा कि “[ उस अवस्थामें ] वह पुण्यसे असम्बद्ध, पापसे असम्बद्ध तथा हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार किये होता है” “इसका वह यह रूप अतिच्छन्दा (काम, धर्माधर्म तथा अविद्यासे रहित) है” “यह परम आनन्द है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः 'मैं सुषुप्तिमें ही जीवभावसे रहित अपने देवतारूपको दिखलाऊँगा' ऐसा आरुणिने कहा। हे सोम्य! मेरे कथन करनेसे तू स्वप्नान्त (सुषुप्तावस्था) को विशेषरूपसे जान ले अर्थात् स्पष्टतया समझ ले। |
छा० उ० २१—