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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३२८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

रखता है। इस सवनके आदित्यगण अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण शब्दादि विषयसमूहको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयुमें कोई [रोगादि] संतप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप आदित्यगण! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर नीरोग हो जाता है॥ ५-६॥

| तथादित्याः प्राणाः। ते हीदं शब्दादिजातमाददतेऽत आदित्याः। तृतीयसवनमायुः षोडशोत्तरवर्षशतं समापयतानुसंतनुत यज्ञं समापयतेत्यर्थः। समानमन्यत्॥ ५-६॥ | इसी प्रकार प्राण ही आदित्य हैं। वे इस शब्दादि विषयसमूहका आदान (ग्रहण) करते हैं, इसलिये आदित्य हैं। [हे प्राणरूप आदित्यगण!] तृतीयसवनको आयुरूपसे अनुसंतत करो अर्थात् एक सौ सोलह वर्ष तक पूर्ण करो यानी इस यज्ञको समाप्त करो। शेष सब पूर्ववत् है॥ ५-६॥ |

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| निश्चिता हि विद्या फलायेत्येतद्दर्शयन्नुदाहरति— | निश्चिता विद्या अवश्य फलवती होती है—इस बातको प्रदर्शित करती हुई श्रुति उदाहरण देती है— |

एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्र ह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥

इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा था—'[अरे रोग!] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोगद्वारा

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२९


मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा था; जो इस प्रकार जानता है वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥

एतद्यज्ञदर्शनं ह स्म वै किल तद्विद्वानाह महिदासो नामतः, इतराया अपत्यमैतरेयः। किं कस्मान्मे ममैतदुपतपनमुपतपसि स त्वं हे रोग; योऽहं यज्ञोऽनेन त्वत्कृतेनोपतापेन न प्रेष्यामि न मरिष्याम्यतो वृथा तव श्रम इत्यर्थः। इत्येवमाह स्मेति पूर्वेण संबन्धः। स एवंनिश्चयः सन् षोडशं वर्षशतमजीवत्। अन्योऽप्येवंनिश्चयः षोडशं वर्षशतं प्रजीवति य एवं यथोक्तं यज्ञसंपादनं वेद जानाति, स इत्यर्थः ॥ ७ ॥इस प्रसिद्ध यज्ञदर्शनको जाननेवाले महिदासनामक इतराके पुत्र ऐतरेयने 'हे रोग ! तू मुझे यह संताप क्यों देता है ? जो यज्ञरूप मैं तेरे इस संतापसे मृत्युको प्राप्त नहीं होऊँगा—नहीं मरूँगा; तात्पर्य यह है कि इसलिये तेरा यह श्रम वृथा ही है—इस प्रकार कहा था—इसका पूर्वसे सम्बन्ध है। ऐसे निश्चयवाला होकर वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा। ऐसे ही निश्चयवाला दूसरा पुरुष भी, जो इस प्रकार पूर्वोक्त यज्ञसम्पादनको जानता है, एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

सप्तदश खण्ड

अक्षयादि फल देनेवाली आत्मयज्ञोपासना

स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ॥ १ ॥

वह [ पुरुष ] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण ( प्रसन्न ) नहीं होता—वही इसकी दीक्षा है ॥ १ ॥

| स यदशिशिषतीत्यादियज्ञ-सामान्यनिर्देशः पुरुषस्य पूर्वेणैव संबध्यते । यदशिशिषत्यशितुमिच्छति, तथा पिपासति पातुमिच्छति, यन्न रमत इष्टाद्यप्राप्तिनिमित्तम्, यदेवंजातीयकं दुःखमनुभवति ता अस्य दीक्षाः, दुःखसामान्याद्विधियज्ञस्येव ।१। | 'वह जो भोजन करनेकी इच्छा करता है' इत्यादि पुरुषका यज्ञसे सादृश्यनिरूपण पूर्वग्रन्थसे ही सम्बन्ध रखता है । जो 'अशिशिषति'—खानेकी इच्छा करता है, तथा 'पिपासति' पीनेकी इच्छा करता है, तथा जो इष्ट पदार्थोंकी अप्राप्तिके कारण रममाण नहीं होता अर्थात् जो इस प्रकारके दुःखका अनुभव करता है, वह, दुःखमें सदृशता होनेके कारण विधियज्ञकी दीक्षाके समान, इसकी दीक्षा है॥१॥ |

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अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ॥२॥

फिर वह जो खाता है, जो पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी सदृशताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१


| अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते रतिं चानुभवतीष्टादि-संयोगात्तदुपसदैः समानतामेति। उपसदां च पयोव्रतत्वनिमित्तं सुखमस्ति। अल्पभोजनीयानि चाहान्यासन्नानीति प्रत्यासो-ऽतोऽशनादीनामुपसदां च सामान्यम् ॥ २ ॥ | फिर वह जो भोजन करता है, पीता है और इष्ट पदार्थादिके संयोग-से रतिका अनुभव करता है—वह सब उपसदोंकी समानताको प्राप्त होता है । उपसदोंको पयोव्रतत्व ( केवल दुग्धपान ) सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है । जिन दिनोंमें स्वल्प आहार प्राप्त हो सकता है वे समीप ही हैं—यह देखकर यज्ञकर्ताको आश्वासन होता है। अतः भोजनादि-की उपसदोंसे सदृशता है ॥ २ ॥ |


अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति ॥ ३ ॥

तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुत शस्त्रकी ही समानताको प्राप्त होते हैं ॥३॥

| अथ यद्धसति यज्जक्षति भक्षयति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तत्समानतामेति; शब्दवत्त्वसामान्यात् ॥ ३ ॥ | तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण करता है और जो मैथुन करता है वह स्तुतशस्त्रकी समानताको प्राप्त होता है; क्योंकि शब्दयुक्त होनेमें उनमें समानता है ॥ ३ ॥ |


अथ यत्तपो दानमार्जवमहिꣳसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः ॥ ४ ॥

तथा जो तप, दान, आर्जव ( सरलता ), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा हैं ॥ ४ ॥