सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३

३१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३


| णत्वं दर्शयति मनोमय इत्या- <br> दिना ज्यायानेभ्यो लोकेभ्य <br> इत्यन्तेन ॥ ३ ॥ | यहाँसे लेकर 'ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः' <br> यहाँतकके ग्रन्थद्वारा उसका अनन्त- <br> परिमाणत्व प्रदर्शित करती है ॥३॥ |


हृदयस्थित ब्रह्म और परब्रह्मकी एकता

सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिद-
मभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मै-
तमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विच-
कित्सास्तोति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥

जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदयकमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर जानेपर मैं इसीको प्राप्त होऊँगा। ऐसा जिसका निश्चय है और जिसे इस विषयमें कोई संदेह भी नहीं है [उसे ईश्वरभावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है, शाण्डिल्यने कहा है ॥ ४ ॥

| यथोक्तगुणलक्षण ईश्वरोऽत्रोपास्यत्वेन ध्येयो न तु तद्गुण- <br><br> (सगुणब्रह्माभिप्रेतं न निर्गुणमिति स्थापनम्) <br><br> विशिष्ट एव। यथा राजपुरुषमानय चित्रगुं वेत्युक्ते न विशेषणस्याप्यानयने व्याप्रियते तद्वदिहापि प्राप्तमतस्तन्निवृत्त्यर्थं सर्वकर्मेत्यादि | पूर्वोक्त गुणोंसे लक्षित होनेवाले ईश्वरका ही ध्यान करना चाहिये, उन गुणोंसे युक्तका नहीं; जिस प्रकार 'राजपुरुषको अथवा चित्रगुको¹ लाओ' ऐसा कहे जानेपर उनके विशेषण (राजा अथवा चित्र-विचित्र गाय) को लानेकी चेष्टा नहीं की जाती उसी प्रकार यहाँ भी निर्गुण ब्रह्म ही [उपास्यरूपसे] प्राप्त होता था; अतः उसकी निवृत्तिके लिये 'सर्व- |


१. जिसकी गाय चित्र-विचित्र रंगकी हो उसे 'चित्रगु' कहते हैं।

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१३


संस्कृतहिन्दी
पुनर्वचनम् । तस्मान्मनोमयत्वादिगुणविशिष्ट एवेश्वरो ध्येयः ।कर्म' इत्यादि विशेषणोंको पुनः कहा गया है। इसलिये मनोमयत्वादि गुणोंसे युक्त ईश्वरका ही ध्यान करना चाहिये ।
अत एव षष्ठसप्तमयोरिव "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८।१६) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) इति नेह स्वाराज्येऽभिषिञ्चति, एष म आत्मेतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति लिङ्गात्; न त्वात्मशब्देन प्रत्यगात्मैवोच्यते, ममेति षष्ठ्याः संबन्धार्थप्रत्यायकत्वात्, एतम् अभिसंभवितास्मीति च कर्मकर्तृत्वनिर्देशात् ।इसी छठे और सातवें अध्यायोंमें श्रुतिने जिस प्रकार "तत्त्वमसि" [तू वह है] और "आत्मैवेदं सर्वम्" [ यह सब आत्मा ही है ] इन वाक्योंद्वारा साधकको स्वाराज्यपर अभिषिक्त किया है उस प्रकार वह यहाँ नहीं करती; 'यह मेरा आत्मा है' 'यह ब्रह्म है' 'मैं यहाँसे मरकर जानेपर इसे प्राप्त होऊँगा' इत्यादि वाक्य इस विषयमें लिङ्ग हैं । यहाँ 'आत्मा' शब्दसे प्रत्यगात्माका ही निरूपण नहीं किया जाता, क्योंकि 'मम' यह षष्ठी उसके सम्बन्धार्थकी प्रतीति करानेवाली है । तथा 'मैं इसे प्राप्त होऊँगा' इन शब्दोंद्वारा ब्रह्म और आत्माके कर्मत्व और कर्तृत्वका निर्देश किया गया है ।
ननु षष्ठेऽप्यथ संपत्स्य इति <br> पूर्वपक्षिण आक्षेपः सत्संपत्तेः कालान्तरितत्वं दर्शयति ।पूर्व०-किंतु छठे अध्यायमें भी 'अथ संपत्स्ये' [ देहत्यागके अनन्तर सत्स्वरूप हो जाऊँगा ] इस वचनसे श्रुतिने सत्स्वरूप होनेमें कालका व्यवधान तो दिखाया ही है ।