छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३०० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
३०० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
तस्यैषा दृष्टिर्यत्रैतदस्मिञ्शरीरे संस्पर्शैनोष्णि-
मानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनद-
मिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं
च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद
य एवं वेद ॥ ८ ॥
उस इस (हृदयस्थित पुरुष) का यही दर्शनोपाय है जब कि [मनुष्य] इस शरीरमें स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु (बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी उपासना करे। जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार उपासना करता है] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात) होता है ॥ ८ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यत्र यस्मिन्काले, एतदिति क्रियाविशेषणम्, अस्मिञ्शरीरे हस्तेनालभ्य संस्पर्शैनोष्णिमानं रूपसहभाविनमुष्णस्पर्शभावं विजानाति, स ह्युष्णिमा नामरूपव्याकरणाय देहमनुप्रविष्टस्य चैतन्यात्मज्योतिषो लिङ्गमव्यभिचारात् । न हि जीवन्तमात्मान- | ‘यत्र’—जिस समय, ‘एतत्’ यह ‘विजानाति’ इस क्रियाका विशेषण है, इस शरीरमें हाथसे स्पर्श करके उस स्पर्शद्वारा रूपके साथ रहनेवाली उष्णताको जानता है; वह उष्णिमा ही नामरूपका विभाग करनेके लिये देहमें अनुप्रविष्ट हुए चैतन्यात्मज्योतिका अनुमान करानेवाला लिङ्ग है, क्योंकि उसका कभी व्यभिचार नहीं होता । जीवित शरीरको उष्णता कभी नहीं |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| मुष्णिमा व्यभिचरति । 'उष्ण एव जीविष्यञ्छीतो मरिष्यन्' इति हि विज्ञायते । मरणकाले च तेजः परस्यां देवतायामिति परेणाविभागत्वोपगमात् । अतोऽसाधारणं लिङ्गमौष्ण्यमग्नेरिव धूमः । अतस्तस्य परस्यैषा दृष्टिः साक्षादिव दर्शनं दर्शनोपाय इत्यर्थः । | त्यागती । जीवित रहनेवाला उष्ण ही होता है और मरनेवाला शीत होता है—ऐसा ही जाना जाता है। मरण-कालमें तेज पर देवतामें लीन हो जाता है, क्योंकि उस समय पर देवताके साथ उसका अभेद हो जाता है। अतः धूम जिस प्रकार अग्निका अनुमापक है उसी प्रकार उष्णता जीवनका असाधारण लिङ्ग है। इसलिये उस पर देवताकी यह दृष्टि यानी साक्षात् दर्शनके समान उसके दर्शनका साधन है—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| तथा तस्य ज्योतिष एषा श्रुतिः श्रवणं श्रवणोपायोऽप्युच्यमानः । यत्र यदा पुरुषो ज्योतिषो लिङ्गं शुश्रूषति तदेतत्कर्णावपिगृह्यैतच्छब्दः क्रियाविशेषणम् । अपिगृह्यापिधायेत्यर्थोऽङ्गुलिभ्यां प्रोर्णुत्य निनदमिव रथस्येव घोषो निनदस्तमिव शृणोति नदथुरिव ऋषभकूजितमिव शब्दो यथा चाग्ने- | तथा यह उस ज्योतिकी श्रुति—श्रवण यानी सुननेका आगे कहा जानेवाला उपाय है। जहाँ—जिस समय पुरुष इस ज्योतिके लिङ्गको सुनना चाहता है उस समय, 'एतत् कर्णावपिगृह्य' यहाँ 'एतत्' शब्द 'अपिगृह्य' क्रियाका विशेषण है, अर्थात् कानोंको इस प्रकार मूँदकर—अङ्गुलियोंसे बंदकर निनदके समान—रथके घोषको 'निनद' कहते हैं, उसके समान शब्द सुनता है तथा नदथु—बैलके डकराने-के समान और जिस प्रकार बाहर |