छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| तस्येति प्रकृतस्य हृदयस्येत्यर्थः। एतस्यानन्तरनिर्दिष्टस्य पञ्च पञ्चसंख्याका देवानां सुषयो देवसुषयः स्वर्गलोकप्राप्तिद्वारच्छिद्राणि, देवैः प्राणादित्यादिभी रक्ष्यमाणानीत्यतो देवसुषयः। तस्य स्वर्गलोकभवनस्य हृदयस्यास्य यः प्राङ् सुषिः पूर्वाभिमुखस्य प्राग्गतं यच्छिद्रं द्वारं स प्राणः, तत्स्थस्तेन द्वारेण यः संचरति वायुविशेषः स प्रागनितीति प्राणः। | ‘तस्य’ अर्थात् उस प्रकृत हृदयके, एतस्य—जिसका अव्यवहित पूर्वमें ही वर्णन किया गया है, पाँच-पाँच संख्यावाले देवसुषि—देवताओंके सुषि अर्थात् स्वर्गलोककी प्राप्तिके द्वारभूत पाँच छिद्र हैं। वे प्राण और आदित्य आदि देवताओंसे सुरक्षित हैं इसलिये देवसुषि कहलाते हैं। स्वर्गलोकके भवनरूप उस इस हृदयका जो प्राङ् सुषि है—पूर्वाभिमुख हृदयका जो पूर्वदिशावर्ती छिद्र यानी द्वार है वह प्राण है। जो उस हृदयमें ही स्थित है और उसीके द्वारा संचार करता है वह वायुविशेष ‘प्राक् अनिति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार प्राण कहलाता है। |
| तेनैव संबद्धमव्यतिरिक्तं तच्चक्षुः, तथैव स आदित्यः “आदित्यो ह वै बाह्यः प्राणः” (प्र० उ० ३।८) इति श्रुतेश्चक्षूरूपप्रतिष्ठाक्रमेण हृदि स्थितः “स आदित्यः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति चक्षुषी” (बृ० उ० ३।९।२०) इत्यादि हि वाजसनेयके। | उस (प्राण) हीसे सम्बद्ध और अभिन्न चक्षु है। इसी प्रकार वह आदित्य भी है, जैसा कि “आदित्य निश्चय ही बाह्य प्राण है” इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वह चक्षु और रूपके प्रतिष्ठाक्रमसे हृदयमें स्थित है। “वह आदित्य किसमें स्थित है ? चक्षुमें” इत्यादि वाजसनेय-श्रुतिमें कहा है। प्राण- |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९१
| प्राणवायुदेवतेव ह्येका चक्षुरादित्यश्च सहाश्रयेण। वक्ष्यति च 'प्राणाय स्वाहेति हुतं हविः सर्वमेतत्तर्पयतीति। <br><br> तदेतत्प्राणाख्यं स्वर्गलोकद्वारपालत्वाद्व्रह्म स्वर्गलोकं प्रतिपित्सुस्तेजश्चैतच्चक्षुरादित्यस्वरूपेणान्नाद्यत्वाच्च सवितुस्तेजोऽन्नाद्यमित्याभ्यां गुणाभ्यामुपासीत। ततस्तेजस्व्यन्नादश्चामयावित्वरहितो भवति य एवं वेद तस्यैतद्गुणफलम्। उपासनेन वशीकृतो द्वारपः स्वर्गलोकप्राप्तिहेतुर्भवतीति मुख्यं च फलम्॥१॥ | वायुरूप एक ही देवता एक ही आश्रयमें स्थित होनेके कारण चक्षु और आदित्य नामसे कहे जाते हैं। 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कहकर दिया हुआ हवि चक्षुरादि सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी तृप्ति करता है—ऐसा आगे कहेंगे भी। <br><br> वह यह प्राणाख्य ब्रह्म स्वर्गलोकका द्वारपाल है अतः स्वर्गप्राप्तिकी इच्छावाला पुरुष, यह चक्षु और आदित्यरूपसे तथा अन्नाद्यरूपसे सविताका तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार इन दो गुणोंसे इसकी उपासना करे। इससे वह तेजस्वी और अन्नाद अर्थात् रुग्णत्वादिसे रहित होता है। जो ऐसा जानता है उसे यह गौण फल प्राप्त होता है; किन्तु मुख्य फल तो यही है कि उपासनाद्वारा अपने अधीन किया हुआ वह द्वारपाल स्वर्गलोकप्राप्तिका कारण होता है ॥ १ ॥ |
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हृदयान्तर्गत दक्षिणसुषिभूत व्यानकी उपासना
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रꣳ स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥
छा० उ० १०—