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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

लो३ कद्वारमपावा३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ-
स्वारा ३३३३३ हु३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ
३२१११ इति ॥ १२ ॥ आदित्यमथ वैश्वदेवं लो-
३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ साम्रा ३ ३
३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११
इति ॥ १३ ॥

लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम स्वाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। यह आदित्यसम्बन्धी साम है; अब विश्वेदेवसम्बन्धी साम कहते हैं—लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥ १२-१३ ॥

—: ० :—

अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—स्वर्गमें रहनेवाले द्युलोकनिवासी आदित्योंको और विश्वेदेवोंको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ ॥ १४ ॥

एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥१५॥

यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान 'आयु समाप्त होनेपर [मैं इसे प्राप्त करूँगा] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—ऐसा कहकर उत्थान करता है ॥ १५ ॥

खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१


| दिविक्षिद्भ्य इत्येवमादि समानमन्यत् । विन्दतापहतेति बहुवचनमात्रं विशेषः । याजमानं त्वेतत् । एतास्म्यत्र यजमान इत्यादिलिङ्गात् ॥ १४-१५ ॥ | ‘दिविक्षिद्भ्यः’ इत्यादि शेष सब अर्थ पहलेके ही समान है। ‘विन्दत, अपहत’ इन क्रियाओंमें बहुवचन होना ही पूर्वकी अपेक्षा विशेष है। ये मन्त्र यजमान-सम्बन्धी हैं, क्योंकि ‘मैं यजमान इस लोकको प्राप्त करनेवाला हूँ’ इत्यादि लिङ्गसे यह स्पष्ट होता है ॥ १४-१५ ॥ |

—:००:—

तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनँ सम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ १६ ॥

उस (यजमान) को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा (यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ १६ ॥

| एष ह वै यजमान एवंविद् यथोक्तस्य सामादेर्विद्वान्यज्ञस्य मात्रां यज्ञयाथात्म्यं वेद यथोक्तम्। य एवं वेद य एवं वेदेति द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ १६ ॥ | एवंवित्—इस प्रकार पूर्वोक्त सामादिको जाननेवाला यह यजमान निश्चय ही यज्ञकी मात्रा—यज्ञके पूर्वोक्त यथार्थ स्वरूपको जानता है। ‘य एवं वेद य एवं वेद’ यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १६ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥

—: ० :—

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्यविवरणे
द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ २ ॥

—: ० :—