छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २
२१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २
स्तवनके समय ध्यानका प्रकार
अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत्स्वधां पितृभ्य
आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं
यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा
ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥
मैं देवताओंके लिये अमृतत्वका आगान ( साधन ) करूँ—इस प्रकार चिन्तन करते हुए आगान करे। पितृगणके लिये स्वधा, मनुष्योंके लिये आशा (उनकी इष्ट वस्तुओं), पशुओंके लिये तृण और जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका आगान करूँ—इस प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥२॥
| अमृतत्वं देवेभ्य आगायानि साधयानि । स्वधां पितृभ्य आगायान्याशां मनुष्येभ्य आशां प्रार्थितमित्येतत् । तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मने मह्यमागायानीत्येतानि मनसा चिन्तयन्ध्यायन्नप्रमत्तः स्वरोष्मव्यञ्जनादिभ्यः स्तुवीत ॥ २ ॥ | मैं देवताओंके लिये अमृतत्वका आगान—साधन करूँ; पितृगणके लिये स्वधाका आगान करूँ; मनुष्योंके लिये आशा यानी प्रार्थित वस्तुका [ साधन करूँ ]। पशुओंके लिये तृण और जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका आगान करूँ—इस प्रकार इन बातोंका मनसे ध्यान-चिन्तन करते हुए स्वर, ऊष्म और व्यञ्जनादिके उच्चारणमें प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥ २ ॥ |
स्वरादि वर्णोंकी देवात्मकता
सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मनः सर्व ऊष्माणः प्रजापते-
रात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपाल-
खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २११
भेतेन्द्रꣳशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥
सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि मैं इन्द्रके शरणागत हूँ; वही तुझे इसका उत्तर देगा ॥३॥
| सर्वे स्वरा अकारादय इन्द्रस्य बलकर्मणः प्राणस्यात्मानो देहावयवस्थानीयाः । सर्वे ऊष्माणः शषसहादयः प्रजापतेर्विराजः कश्यपस्य वात्मानः । सर्वे स्पर्शाः कादयो व्यञ्जनानि मृत्योरात्मानः । | अकारादि सम्पूर्ण स्वर, बल ही जिसका कर्म है उस इन्द्र यानी प्राणके आत्मा अर्थात् देह देहावयवस्थानीय हैं। श ष स ह आदि समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके अर्थात् विराट् या कश्यपके आत्मा हैं। क आदि (कवर्गसे लेकर पवर्ग तक) सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण यानी व्यञ्जन मृत्युके आत्माके हैं। |
| तमेवंविदमुद्गातारं यदि कश्चित्स्वरेषूपालभेत स्वरस्त्वया दुष्टः प्रयुक्त इत्येवमुपालब्ध इन्द्रं प्राणमीश्वरं शरणमाश्रयं प्रपन्नोऽभूवं स्वरान्प्रयुञ्जानोऽहं स इन्द्रो यत्तव वक्तव्यं त्वा त्वां प्रति वक्ष्यति स एव देव उत्तरं दास्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥ | इस प्रकार जाननेवाले उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंमें उपालम्भ दे—'तूने दोषयुक्त स्वरका प्रयोग किया है'—इस प्रकार उपालम्भ दिये जानेपर वह उसे यह उत्तर दे कि स्वरोंका प्रयोग करते समय मैं इन्द्र अर्थात् प्राणरूप ईश्वरके शरणागत—आश्रित था; अतः तुझे जो कुछ उत्तर देना होगा, वह इन्द्रदेव ही देगा ॥ ३ ॥ |
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