छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
२०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
वह, जो इस प्रकार सबमें अनुस्यूत इस सामको जानता है सर्वरूप हो जाता है ॥ २ ॥
| सर्वं ह भवति सर्वेश्वरो भवतीत्यर्थः। निरुपचरितसर्वभावे हि दिक्स्थेभ्यो बलिप्राप्त्यनुपपत्तिः ॥ २ ॥ | सर्व हो जाता है अर्थात् सर्वेश्वर हो जाता है; क्योंकि सर्वभावका उपचार हुए बिना सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुषोंसे बलि प्राप्त होना सम्भव नहीं है ॥ २ ॥ |
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सर्वविषयक सामकी उपासनाका उत्कर्ष
तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ ३ ॥
इसी विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है ॥३॥
| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽप्यस्ति । यानि पञ्चधा पञ्चप्रकारेण हिंकारादिविभागैः प्रोक्तानि त्रीणि त्रीणि त्रयीविद्यादीनि तेभ्यः पञ्चत्रिकेभ्यो ज्यायो महत्तरं परं च व्यतिरिक्तमन्यद्वस्त्वनन्तरं नास्ति न विद्यत इत्यर्थः । तत्रैव हि सर्वस्यान्तर्भावः ॥ ३ ॥ | इसी अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र भी है । हिंकारादि-विभागोंद्वारा जो पाँच प्रकारसे बतलाये हुए तीन-तीन हैं यानी त्रयीविद्या आदि हैं, उन पाँच त्रिकोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट-महान् और उनसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं है—यह इसका तात्पर्य है। अर्थात् उन्हींमें सम्पूर्ण वस्तुओंका अन्तर्भाव हो जाता है ॥ ३ ॥ |
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यस्तद्वेद स वेद सर्वꣳसर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासीत तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ ४ ॥
खण्ड २१ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७
जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ बलि समर्पित करती हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना करे—यह नियम है, यह नियम है ॥ ४ ॥
| यस्तद्यथोक्तं सर्वात्मकं साम वेद स वेद सर्वं स सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः । सर्वा दिशः सर्वदिक्स्था अस्मा एवंविदे बलिं भोगं हरन्ति प्रापयन्तीत्यर्थः । सर्वमस्मि भवामीत्येवमेतत्सामोपासीत तस्यैतदेव व्रतम् । द्विरुक्तिः सामोपासनसमाप्त्यर्था ॥ ४ ॥ | जो पुरुष इस पूर्वोक्त सर्वात्मक सामको जानता है, वह सबको जानता है; अर्थात् वह सर्वज्ञ हो जाता है । सम्पूर्ण दिशाएँ—सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुष इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकके प्रति बलि यानी भोग उपस्थित करते हैं, अर्थात् उसे भोगोंकी प्राप्ति कराते हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इसी प्रकार इस सामकी उपासना करे—उस उपासकके लिये यही नियम है । यहाँ जो द्विरुक्ति है वह सामोपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥
द्वाविंश खण्ड
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विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना
| सामोपासनप्रसङ्गेन गानविशेषादिसंपदुद्गातुरुपदिश्यते; फलविशेषसंबन्धात् । | सामोपासनाके प्रसङ्गसे उद्गाताको गानविशेषादि¹ सम्पत्तिका उपदेश किया जाता है, क्योंकि इससे फलविशेषका सम्बन्ध होता है । |
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विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥
सामके ‘विनर्दि’ नामक गानका वरण करता हूँ; वह पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोमका निरुक्त है, वायुका मृदुल और श्लक्ष्ण ( सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य ) है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पति का क्रौञ्च ( क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान ) है और वरुणका अपध्वान्त (भ्रष्ट) है । इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे; केवल वरुणसम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे ॥ १ ॥
| विनर्दि विशिष्टो नर्दः स्वरविशेष ऋषभकूजितसमोऽस्यास्तीति विनर्दि गानमिति वाक्य- | विनर्दि—जिसका नर्द यानी स्वरविशेष ऋषभ ( बैल ) के शब्दके समान विशिष्ट है वह विनर्दिगान है, यहाँ ‘गान’ शब्द वाक्यशेष है । वह विनर्दि गान पशुओंके |
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१. ‘आदि’ शब्दसे स्वर एवं वर्णादि समझने चाहिये ।
खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
| शाङ्करभाष्य | शाङ्करभाष्यार्थ |
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| शेषः। तच्च साम्नः संबन्धि पशुभ्यो हितं पशव्यमग्नेरग्निदैवत्यं चोद्गीथ उद्गानम्। तदहमेवं विशिष्टं वृणे प्रार्थय इति कश्चिद्यजमान उद्गाता वा मन्यते। | लिये हितकर और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ—उद्गान है। इस प्रकारके उस विशिष्ट सामका मैं वरण करता हूँ अर्थात् उसके लिये प्रार्थना करता हूँ—इस प्रकार कोई यजमान अथवा उद्गाता मानता है। |
| अनिरुक्तोऽमुकसम इत्यविशेषितः प्रजापतेः प्रजापतिदैवत्यः स गानविशेषः, आनिरुक्त्यात्प्रजापतेः। निरुक्तः स्पष्टः सोमस्य सोमदैवत्यः स उद्गीथ इत्यर्थः। मृदु श्लक्ष्णं च गानं वायोर्वायुदैवत्यं तत्। श्लक्ष्णं बलवच्च प्रयत्नाधिक्योपेतं चेन्द्रस्यैन्द्रं तद्गानम्। क्रौञ्चं क्रौञ्चपक्षिनिनादसमं बृहस्पतेर्बार्हस्पत्यं तत्। अपध्वान्तं भिन्नकांस्यस्वरसमं वरुणस्यैतद्गानम्। तान् सर्वानिवोपसेवेत प्रयुञ्जीत वारुणं त्वेवैकं वर्जयेत् ॥ १ ॥ | प्रजापतिका जो गानविशेष है, वह अनिरुक्त है अर्थात् अमुकके तुल्य है—इस प्रकार विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रजापति भी विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जाता। सोमका अर्थात् सोमदेवतासम्बन्धी जो उद्गीथ है, वह निरुक्त यानी स्पष्ट है। जो गान मृदु और श्लक्ष्ण है, वह वायुका यानी वायुदेवतासम्बन्धी है। जो श्लक्ष्ण और बलवान् यानी अधिक प्रयत्नकी अपेक्षावाला है, वह इन्द्रका यानी इन्द्रसम्बन्धी गान है। जो क्रौञ्च यानी क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान है, वह बृहस्पतिका यानी बृहस्पतिदेवतासम्बन्धी गान है। अपध्वान्त अर्थात् फूटे हुए काँसेके स्वरके समान जो है, वह वरुणदेवतासम्बन्धी गान है। उन सभीका सेवन अर्थात् प्रयोग करे, एकमात्र वरुणसम्बन्धी गानका ही त्याग करे ॥ १ ॥ |