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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

| १६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |

१६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| चक्षुरुद्गीथः, वाचो बहुतरविषयं प्रकाशयति चक्षुरतो वरीयो वाचः, उद्गीथः श्रेष्ठ्यात् । श्रोत्रं प्रतिहारः, प्रतिहृतत्वात्, वरीयश्चक्षुषः सर्वतः श्रवणात् । मनो निधनम्, मनसि हि निधीयन्ते पुरुषस्य भोग्यत्वेन सर्वेन्द्रियाहृता विषयाः, वरीयस्त्वं च श्रोत्रान्मनसः, सर्वेन्द्रियविषयव्यापकत्वात्, अतोन्द्रियविषयोऽपि मनसो गोचर एवेति । यथोक्तहेतुभ्यः परोवरीयांसि प्राणादीनि वा एतानि ॥ १ ॥ | चक्षु उद्गीथ है; चक्षु वाणीसे भी अधिक विषयको प्रकाशित करता है; अतः वह वाणीसे उत्कृष्ट है और उत्कृष्ट होनेके कारण ही उद्गीथ है । श्रोत्र प्रतिहार है, क्योंकि वह प्रतिहत है तथा सब ओरसे श्रवण करनेके कारण वह नेत्रकी अपेक्षा उत्कृष्ट भी है। मन निधन है क्योंकि भोग्यरूपसे पुरुषकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए विषय मनमें ही रखे जाते हैं, तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंमें व्यापक होनेके कारण श्रोत्रकी अपेक्षा मनकी उत्कृष्टता भी है । तात्पर्य यह है कि जो पदार्थ अन्य इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे है वह भी मनका विषय तो है ही । उपर्युक्त हेतुओंसे ये प्राणादि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट हैं ॥ १ ॥ |


परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ २ ॥

जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्राणोंमें पाँच प्रकारके उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत लेता है । यह पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥ २ ॥

खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
एतद्दृष्ट्या विशिष्टं यः परोवरीयः सामोपास्ते परोवरीयो हास्य जीवनं भवतीत्युक्तार्थम् । इति तु पञ्चविधस्य साम्न उपासनमुक्तमिति सप्तविधे वक्ष्यमाणविषये बुद्धिसमाधानार्थम् । निरपेक्षो हि पञ्चविधे वक्ष्यमाणे बुद्धिं समाधित्सति ॥ २ ॥जो पुरुष इस प्राणदृष्टिसे युक्त उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी उपासना करता है उसका जीवन निश्चय ही उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है—यह अर्थ पहले (१ । ९ । २ में) कहा जा चुका है । इस प्रकार यह पाँच प्रकारके सामकी उपासना तो कह दी गयी; यह बात श्रुतिने आगे कही जानेवाली सप्तविध सामोपासनामें बुद्धिको समाहित करनेके लिये कही है, क्योंकि पञ्चविध सामोपासनामें निरपेक्ष हुआ पुरुष ही आगे कही जानेवाली उपासनामें बुद्धिको समाहित करना चाहेगा ॥ २ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥

अष्टम खण्ड

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वाणीविषयक सप्तविध सामोपासना

अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधँ सामोपासीत यत्किं च वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥ १ ॥

अब सप्तविध सामकी उपासनाका प्रकरण [ आरम्भ किया जाता ] है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें जो कुछ 'हुँ' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप है वह आदि है ॥ १ ॥

| अथानन्तरं सप्तविधस्य समस्तस्य साम्न उपासनं साध्विद्मारभ्यते । वाचीति सप्तमी पूर्ववत् । वाग्दृष्टिविशिष्टं सप्तविधं सामोपासीतेत्यर्थः । यत्किञ्च वाचः शब्दस्य हुमिति यो विशेषः स हिंकारो हकारसामान्यात् । यत्प्रेति शब्दरूपं स प्रस्तावः प्रसामान्यात् । यत् आ | अब इसके पश्चात्—यह सप्तविध समस्त सामकी साधु उपासना आरम्भ की जाती है। श्रुतिमें 'वाचि' इस पदकी सप्तमी विभक्ति पूर्ववत् ('लोकेषु' आदि पदोंकी सप्तमीके समान ) समझनी चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि वाग्दृष्टिविशिष्ट सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये। जो कुछ वाणी अर्थात् शब्दका 'हूँ' ऐसा विशेषरूप है वह हिंकार है, क्योंकि 'हूँ' और हिंकारमें हकारकी समानता है जो कुछ 'प्र' ऐसा शब्दरूप है वह प्रस्ताव है, क्योंकि उन दोनोंमें 'प्र' शब्दका सादृश्य है । तथा जो कुछ |

खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थं १७१


| इति स आदिः, आकारसामान्यात् आदिरित्योङ्कारः, सर्वादित्वात् ॥ १ ॥ | 'आ' ऐसा शब्दरूप है वह आकारमें समता होनेके कारण आदि है । 'आदि' यह ओङ्कारका वाचक है, क्योंकि वही सबका आदि है ॥१॥ |


यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम् ॥ २ ॥

जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ है, जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव है और जो कुछ 'नि' ऐसा शब्दरूप है वह निधन है ॥ २ ॥


| यदुदिति स उद्गीथः, उत्पूर्वत्वादुद्गीथस्य । यत्प्रतीति स प्रतिहारः, प्रतिसामान्यात् । यदुपेति स उपद्रव उपोपक्रमत्वादुपद्रवस्य । यन्नीति तन्निधनम्, निशब्दसामान्यात् ॥२॥ | जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ है, क्योंकि 'उद्गीथ' शब्दके आरम्भमें 'उत्' है; जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्दस्वरूप है वह प्रतिहार है, क्योंकि उनमें 'प्रति' शब्दका सादृश्य है; जो कुछ 'उप' ऐसा शब्दरूप है वह उपद्रव है, क्योंकि उपद्रव शब्दके आरम्भमें 'उप' शब्द है तथा जो कुछ 'नि' ऐसा शब्दरूप है वह निधन है, क्योंकि 'नि' और 'निधन' में 'नि' शब्दकी समानता है ॥ २ ॥ |


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