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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

१२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

१२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

| एवमुक्तवन्तं जायोवाच— हन्त गृहाण हे पत इम एव ये मद्धस्ते विनिश्क्षिप्तास्त्वया कुल्माषा इति। तान्खादित्वामुं यज्ञं राज्ञो विततं विस्तारितमृत्विग्भिरेयाय ॥ ७ ॥ | इस प्रकार कहते हुए उषस्तिसे उसकी पत्नीने कहा—'हे स्वामिन्! आप इन उड़दोंको ही लीजिये जिन्हें आपने मेरे हाथमें दिया था। उषस्ति उन्हें खाकर राजाके उस वितत-ऋत्विजोंद्वारा विस्तारपूर्वक सम्पादित होनेवाले यज्ञमें गया ॥ ७ ॥ |


राजयज्ञमें उषस्ति और ऋत्विजोंका संवाद

तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥

वहाँ [जाकर वह] आस्ताव (स्तुति) के स्थानमें स्तुति करते हुए उद्गाताओंके समीप बैठ गया और उसने प्रस्तोतासे कहा—॥ ८ ॥

| तत्र च गत्वोद्गातॄनुद्गातृपुरुषानागत्य स्तुवन्त्यस्मिन्नित्यास्तावस्तस्मिन्नास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश समीप उपविष्टस्तेषामित्यर्थः। उपविश्य स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥ | और वहाँ जाकर वह उद्गाता लोगोंके पास आ आस्तावमें—जिस स्थानमें (प्रस्तोतागण) स्तुति करते हैं, उसे आस्ताव कहते हैं, उसमें—स्तुति करते हुए उद्गाताओंके समीप बैठ गया। तथा वहाँ बैठकर उसने प्रस्तोतासे कहा—॥ ८ ॥ |


प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥

हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्ताव-भक्तिमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ९ ॥

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ १२९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
हे प्रस्तोतरित्यामन्त्र्याभिमुखीकरणाय । या देवता प्रस्तावं प्रस्तावभक्तिमनुगतान्वायत्ता तां चेद्देवतां प्रस्तावभक्तेरविद्वान्सन् प्रस्तोष्यसि विदुषो मम समीपे ।‘हे प्रस्तोतः !’—इस प्रकार अपनी ओर लक्ष्य करानेके लिये सम्बोधन करते हुए [वह बोला—] ‘जो देवता प्रस्तावमें—प्रस्तावभक्तिमें अन्वायत्त यानी अनुगत है, यदि उस प्रस्तावभक्तिके देवताको बिना जाने ही तू उसका, उसे जाननेवाले मेरे समीप, प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ।’
तत्परोक्षेऽपि चेद्विपतेत्तस्य मूर्धा कर्ममात्रविदामनधिकार एव कर्मणि स्यात् । तच्चानिष्टम्, अविदुषामपि कर्मदर्शनात्, दक्षिणमार्गश्रुतेश्च । अनधिकारे चाविदुषामुत्तर एवैको मार्गः श्रूयेत । न च स्मार्तकर्मनिमित्त एव दक्षिणः पन्थाः, “यज्ञेन दानेन” इत्यादिश्रुतेः । 'तथोक्तस्य मया' इति च विशेषणाद्विद्वत्समक्षमेव कर्मण्यनधिकारो न सर्वत्राग्नि-यदि यह माना जाय कि देवतां-ज्ञानियोंके परोक्षमें भी मस्तक गिर जायगा तो केवल कर्मका ही ज्ञान रखनेवालोंका कर्ममें अनधिकार ही सिद्ध होगा । और यह बात माननीय नहीं है, क्योंकि कर्म तो अविद्वानोंको भी करते देखा जाता है और दक्षिणमार्गका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । और यदि उनका अधिकार न होता तो श्रुतिमें एकमात्र उत्तरमार्गका ही प्रतिपादन किया होता, क्योंकि दक्षिण मार्ग केवल स्मार्त कर्मके ही कारण प्राप्त होनेवाला नहीं है, जैसा कि “यज्ञसे दानसे” इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । तथा ‘मेरेद्वारा इस प्रकार कहे हुए’ इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निरूपण किये जानेके कारण भी विद्वान्के सामने ही उसे कर्मका अधिकार नहीं है । अग्निहोत्र