छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
१२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| प्यायैतमुद्गीथदर्शनमुक्त्वोवाच । यावत्ते तव प्रजायां प्रजासंततावित्यर्थः। एनमुद्गीथं त्वत्संततिजा वेदिष्यन्ते ज्ञास्यन्ति तावन्तं कालं परोवरीयो हैभ्यः प्रसिद्धेभ्यो लौकिकजीवनेभ्य उत्तरोत्तरविशिष्टतरं जीवनं तेभ्यो भविष्यति ॥ ३ ॥ | वर्णन करके कहा—'जबतक तेरी प्रजामें अर्थात् तेरी संततिमें तेरे गोत्रज इस उद्गीथको जानेंगे तबतक—उतने समयतक उन्हें इन प्रसिद्ध लौकिक जीवनोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर विशिष्टतर जीवन प्राप्त होगा' ॥ ३ ॥ |
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तथामुष्मिँल्लोके लोक इति । स य एतदेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ ४ ॥
तथा परलोकमें भी उसे [उत्कृष्टसे उत्कृष्ट] लोककी प्राप्ति होती है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इसकी उपासना करता है, उसका जीवन निश्चय ही इस लोकमें उत्कृष्टतर होता है तथा परलोकमें भी उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है—परलोकमें उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
| तथादृष्टेऽपि परलोकेऽमुष्मिन्परोवरीयाँल्लोको भविष्यतीत्युक्तवाञ्शाण्डिल्यायातिधन्वा शौनकः। स्यादेतत्फलं पूर्वेषां महा- | 'तथा अदृष्ट परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोककी ही प्राप्ति होगी'—ऐसा शौनकपुत्र अतिधन्वा-ने शाण्डिल्यके प्रति कहा। 'यह फल पूर्वकालिक परम भाग्यशाली |
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खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
| भाग्यानां नैदंयुगीनानामित्या- | पुरुषोंको प्राप्त होता होगा, वर्तमान युगके पुरुषोंको नहीं हो सकता' |
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| शङ्कानिवृत्तय आह—स यः | ऐसी आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—'इस समय भी इसे |
| कश्चिदेतदेवं विद्वानुद्गीथमेतर्ह्युपा- | इस प्रकार जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है |
| स्ते तस्याप्येवमेव परोवरीय एव | उसका भी इस लोकमें उसी प्रकार उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर ही जीवन |
| हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भवति | होता है तथा परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोककी ही |
| तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके | प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥ |
| लोक इति ॥ ४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
उषस्तिका आख्यान
| उद्गीथोपासनप्रसङ्गेन प्रस्तावप्रतिहारविषयमप्युपासनं वक्तव्यमितीदमारभ्यते। आख्यायिका तु सुखावबोधार्था। | उद्गीथोपासनाके प्रसङ्गसे यहाँ प्रस्ताव एवं प्रतिहारविषयक उपासना भी बतलायी जानी चाहिये, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है, वह सरलतासे समझनेके लिये है— |
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मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥ १ ॥
ओले और पत्थर पड़नेसे कुरुदेशके खेतीके चौपट हो जानेपर वहाँ इभ्य ग्रामके भीतर 'आटिकी' (जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी अल्पवयस्का) पत्नीके साथ चक्रका पुत्र उषस्ति दुर्गतिकी अवस्थामें रहता था ॥ १ ॥
| मटचीहतेषु मटच्योऽशनयस्ताभिर्हतेषु नाशितेषु कुरुषु कुरुसस्येष्वित्यर्थः। ततो दुर्भिक्षे जात आटिक्यानुपजातपयोधरादिस्त्रीव्यञ्जनया सह जाययोषस्तिर्ह नामतश्चक्रस्यापत्यं चाक्रायणः। इभो हस्ती तमर्हतीतीभ्य | [कुरुओंके] मटचीहत होनेपर— मटची ओले और पत्थरको कहते हैं, उनसे कुरुदेशके अर्थात् कुरुदेशकी खेतीके हत-नष्ट हो जाने तथा उसके कारण दुर्भिक्ष हो जानेपर आटिकी यानी जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी स्त्रीके साथ उषस्तिनामक चाक्रायण—चक्रका पुत्र इभ्य ग्राममें—इभ हाथीको |
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| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२३ |
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| ईश्वरो हस्त्यारोहो वा, तस्य ग्राम इभ्यग्रामस्तस्मिन्प्रद्राणकोऽन्नालाभात् । द्रा कुत्सायां गतौ । कुत्सितां गतिं गतोऽन्त्यावस्थां प्राप्त इत्यर्थः । उवासोषितवान् कस्यचिद्गृहमाश्रित्य ॥ १ ॥ | कहते हैं, उसकी पात्रता रखनेवाला व्यक्ति इभ्य—धनी या हाथीवान—कहलाता है, उसके ग्रामको इभ्यग्राम कहते हैं, उसमें अन्न प्राप्त न होनेके कारण प्रद्राणक हो—'द्रा' धातुका प्रयोग कुत्सित गतिके अर्थमें होता है, अतः कुत्सित गति यानी दुरवस्थाको प्राप्त हो किसीके घरका आश्रय लेकर निवास करता था॥१॥ |
स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तꣳहोवाच ।<br>नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥२॥
उसने घुने हुए उड़द खानेवाले एक महावतसे याचना की। तब उसने उससे कहा—इन जूठे उड़दोंके सिवा मेरे पास और नहीं हैं। जो कुछ एकत्र थे वे सब-के-सब ये मैंने [ अपने भोजनपात्रमें ] रख लिये हैं [ अतः मैं किस प्रकार आपकी याचना पूर्ण करूँ ? ] ॥ २ ॥
| सोऽन्नार्थमटन्निभ्यं कुल्माषान्कुत्सितान्माषान्खादन्तं भक्षयन्तं यदृच्छयोपलभ्य बिभिक्षे याचितवान् । तमुषस्तिं होवाचेभ्यः । नेतोऽस्मान्मया भक्ष्यमाणादुच्छिष्टराशेः कुल्माषा अन्ये न विद्यन्ते । यच्च ये राशौ मे ममोपनिहिताः प्रक्षिप्ता इमे भाजने किं करोमि ? ॥ २ ॥ | अन्नके लिये घूमते-घूमते उसने अकस्मात् एक हाथीवानको घुने उड़द खाते देख उसने याचना की। उस उषस्तिसे हाथीवानने कहा—मेरेद्वारा खाये जाते हुए इन जूठे उड़दोंके समूहके सिवा मेरे पास और उड़द नहीं हैं। जो एकत्रित थे वे सभी मेरे इस पात्रमें गिरा लिये गये हैं, अब मैं क्या करूँ ? ॥ २ ॥ |