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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
प्रथम अध्याय
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प्रथम अध्याय
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ओमित्येतदक्षरमित्याद्यष्टाध्यायी छान्दोग्योपनिषत् । तस्याः संक्षेपतोऽर्थजिज्ञासुभ्य ऋजुविवरणमल्पग्रन्थमिदमारभ्यते ।<br><br>तत्र सम्बन्धः—समस्तं कर्माधिगतं प्राणादिदेवताविज्ञानसहितमर्चिरादिमार्गेण ब्रह्मप्रतिपत्तिकारणम् । (प्रयोजनम्) केवलं च धूमादिमार्गेण चन्द्रलोकप्रतिपत्तिकारणम् । स्वभावप्रवृत्तानां च मार्गद्वयपरिभ्रष्टानां कष्टाधोगतिरुक्ता । | 'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाला यह आठ अध्यायोंका ग्रन्थ छान्दोग्य उपनिषद् है। उसका अर्थ जाननेकी इच्छावालोंके लिये इस छोटे-से ग्रन्थके रूपमें उसकी सरल व्याख्या संक्षेपसे आरम्भ की जाती है।<br><br>वहाँ [कर्मकाण्डके साथ] इसका सम्बन्ध इस प्रकार है—[विहित और निषिद्ध रूपसे] जाने हुए समस्त कर्मका प्राणादि देवताओंके विज्ञानपूर्वक अनुष्ठान करनेपर वह अर्चि आदि (देवयान) मार्गके द्वारा ब्रह्मलोककी प्राप्तिका कारण होता है तथा केवल (उपासनारहित) कर्म धूमादि मार्गसे चन्द्रलोककी प्राप्तिका हेतु होता है। जो इन दोनों मार्गोंसे पतित एवं स्वभावानुसार प्रवृत्त होनेवाले होते हैं उनकी कष्टमयी अधोगति बतलायी गयी है। |
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खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २७
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| न चोभयोर्मार्गयोरन्यतर-<br>स्मिन्नपि मार्ग आत्यन्तिकी<br>पुरुषार्थसिद्धिरित्यतः कर्मनिर-<br>पेक्षमद्वैतात्मविज्ञानं संसार-<br>गतित्रयहेतूपमर्देन वक्तव्यमित्यु-<br>पनिषदारभ्यते । | इन दोनों मार्गोंमेंसे किसी भी एक मार्गपर रहनेसे आत्यन्तिक पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। अतः संसार-की [उपर्युक्त] त्रिविध गतियोंके हेतु-भूत कर्मका निराकरण करते हुए कर्मकी अपेक्षासे रहित अद्वैत-आत्म-ज्ञानका प्रतिपादन करना है; इसी उद्देश्यसे इस उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। |
| न चाद्वैतात्मविज्ञानादन्यत्रा-<br>ज्ञानस्यैव त्यान्तिकी निःश्रेय-<br>मोक्षसाधनत्वम् सम्प्राप्तिः । वक्ष्यति<br>हि—"अथ येऽन्यथातो विदुरन्य-<br>राजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति ।"<br>(छा० उ० ७ । २५ । २)<br>विपर्यये च "स स्वराड्भवति"<br>(छा० उ० ७।२५।२) इति । | अद्वैतात्मविज्ञानके बिना और किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसा कि आगे कहेंगे भी—"जो लोग इस (अद्वैतात्मज्ञान) से विपरीत जानते हैं, वे अन्यराज (अनात्माके अधीन) होते और क्षीण होनेवाले लोकोंमें जाते हैं।" किंतु इससे विपरीत आत्म-ज्ञान होनेपर [श्रुति कहती है कि] "वह स्वराट् होता है।" |
| तथा द्वैतविषयानृताभिसंधस्य<br>बन्धनं तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे<br>बन्धदाहभावः संसारदुःखप्राप्ति-<br>श्चेत्युक्त्वाद्वैतात्मसत्याभिसंध- | इस प्रकार तपे हुए परशुको ग्रहण करनेसे चोरके जलने और बन्धनमें पड़नेके समान द्वैतविषय-रूप मिथ्यामें अभिनिवेश रखनेवाले पुरुषका बन्धन होता है तथा उसे सांसारिक दुःखोंकी प्राप्ति होती है—यह बतलाकर श्रुति |