पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
चित्रदीपप्रकरणम् १३७
चित्रदीपप्रकरणम् १३७
आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा।
कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥
शुक्तिरजत के दृष्टान्त में जैसे आरोपित पदार्थ का नाम
'रूप्य' होता है इसी प्रकार कूटस्थ में कल्पित जो विक्षेप
[चिदाभास] है उसका ही नाम 'अहम्' होता है।
इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते ।
तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥
'इदं' भाग को स्वतः [आंखों से] देखता हुआ भी जैसे
झूठ मूठ ही यह अभिमान कर लेता है कि यह तो 'रूप्य' है,
इसी प्रकार अपने आपको स्वतः देखकर भी वृथा ही 'मैं' ऐसा
अभिमान कर बैठता है। [जब हम अपने आप को देखते हों
तब हमको 'अहं' आदि कोई भी शब्द बोलने की आवश्यकता
नहीं होती है तो भी यह जीव 'मैं' कह ही बैठता है]
इदन्त्वरूप्यते भिन्ने स्वत्वाहन्ते तथेष्यताम् ।
सामान्यं च विशेषश्च ह्युभयत्रापि 'गम्यते ॥३८॥
इदन्ता तथा रूप्यता जैसे भिन्न भिन्न हैं, इसी प्रकार स्वत्व
और अहन्ता भी भिन्न भिन्न ही हैं। परन्तु इन दोनों [दृष्टान्त
तथा दार्ष्टान्तिक] में ही सामान्यविशेषभाव तो समानं ही है।
शंका यह है कि स्वयं और अहं शब्द एकार्थक हैं, फिर
दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में समता कैसे होगी ? इसका उत्तर यह
दिया गया कि—इदं और और रूप्य शब्दार्थों में तथा स्वयं
और अहं शब्दार्थों में सामान्य विशेष भाव तो समान ही है।
उसी समता को लेकर यह दृष्टान्त दिया गया है।
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१३८ पञ्चदशी
देवदत्तः स्वयं गच्छेत् त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा ।
अहं स्वयं न शक्नोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥
देवदत्त स्वयं जाता है तो जाय, तू स्वयं देखता है तो देख
पर मैं तो स्वयं ऐसा नहीं कर सकता हूँ, ऐसे प्रयोग लोक
होते हैं [इससे स्वयं शब्दार्थ सामान्यरूप होता है और अहं
[मैं] उसका विशेष है यह बात प्रकट होगयी] ।
इदं रूप्यमिदं वस्त्रमिति यद्वदिदं तथा ।
असौ त्वमहमित्येषु स्वयमित्यभिमन्यते ॥४०॥
'यह रूप्य है' 'यह वस्त्र है' इत्यादि उदाहरणों में जैसे इदं
शब्दार्थ सामान्य है, इसी प्रकार असौ [यह] त्वम् [तू]
अहम् [मैं] इन तीनों ही में [के साथ] स्वयं यह शब्द कहा
जाता है । [इससे स्वयं का अर्थ भी सामान्य ही समझना
चाहिये और अहं का अर्थ विशेष लेना चाहिये ] ।
अहन्त्वाद्भिद्यतां स्वत्वं कूटस्थे तेन किं तव ।
स्वयंशब्दार्थ एवैष कूटस्थ इति मे भवेत् ॥४१॥
प्रश्नकर्त्ता पूछता है कि—'स्वपन' 'अहं' से भिन्न है तो हुआ
करो, इससे कूटस्थ आत्मा के विषय में क्या सिद्ध करना
चाहते हो ? उत्तर यह है कि—'यह सामान्य रूप जो स्वयं
शब्दार्थ है वह ही तो कूटस्थ है' यह मेरी बात सिद्ध हो
जाती है ।
अन्यत्ववारकं स्वत्वमिति चेदन्यवारणम् ।
कूटस्थस्यात्मतां वक्तु रिष्टमेव हि तद्भवेत् ॥४२॥
स्वत्व तो अन्यत्व का वारण किया करता है, ऐसा यदि
चित्रदीपप्रकरणम् १३९
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कहा जाय तो कूटस्थ को आत्मा बतानेवाले मेरे मत में यह
अन्यत्व का वारण तो इष्ट ही होता है ।
शंका यह हैकि स्वत्वरूपी धर्म,अन्यता का वारण करता
है अर्थात् जो 'स्व' है वह अन्य नहीं हो सकता, परन्तु वह
कूटस्थता का बोध तो नहीं कराता । इसका समाधान यह है
कि स्वयं शब्द का अर्थ जो कूटस्थ तत्व है वही तो आत्मा है
इस कारण स्वत्व से यदि अन्य का वारण होता है तो यह इष्ट
ही है । [जो अनात्मा है उसका वारण कर देने से आत्मा तो
स्वयं ही शेष रह जाता है फिर उसके लिये कुछ भी करना नहीं
पड़ता । यों जब यह स्वयं शब्द अन्यों को हटा देता है तब
अर्थात् ही इससे कूटस्थ का बोध हो जाता है । ]
स्वयमात्मेति पर्यायौ, तेन लोके तयोः सह ।
प्रयोगो नास्त्यतः स्वत्वमात्मत्वं चान्यवारकम् ॥४३॥
स्वयम् और आत्मा इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है ।
यही कारण है कि लोक में इन दोनों शब्दों का एक साथ
प्रयोग नहीं होता । निचोड़ तो यही है कि स्वत्व और आत्मत्व
दोनों ही अन्य के वारक हैं । यों स्वयं शब्द का अर्थ कूटस्थ
आत्मा ही है, क्योंकि ये दोनों पर्यायवाचक हैं ।
घटः स्वयं न जानातीत्येवं स्वत्वं घटादिषु ।
अचेतनेषु दृष्टं चेद् दृश्यतामात्मसत्त्वतः ॥४४॥
यदि कहो कि 'घट स्वयं नहीं जानता' इस वाक्य में
अचेतन घटादि पदार्थों में भी स्वत्व देखा जाता है फिर स्वत्व
और आत्मत्व भिन्न भिन्न क्यों नहीं है ? तो इसका समाधान
यह है कि—घटादि जड पदार्थों में भी स्फुरण रूप से आत्म
१५० पञ्चदशी
चैतन्य तो रहता ही है [ इस कारण उन जड पदार्थों को
भी स्वयं कह देने से कोई विरोध नहीं होता । यों भी स्वयन्ता
और आत्मता एक ही बात हो जाती है । ]
चेतनाचेतनभिदा कूटस्थात्मकृता न हि ।
किन्तु बुद्धिकृताभासकृतैवेत्यवगम्यताम् ॥४५॥
घट आदि जड पदार्थों में भी जब आत्मचैतन्य है तो
फिर चेतन और अचेतन का भेद क्यों है ? इसका उत्तर दिया
जाता है कि—चेतन और अचेतन का भेद बुद्धिकृत आभास
[चिदाभास] के कारण से ही है [ जहाँ चिदाभास होता है
उसे चेतन कहा जाता है । जहाँ चिदाभास नहीं होता उसे
अचेतन कहते हैं । यह चेतन और अचेतन का भेद तो चेतन
के आभास के पड़ने और न पड़ने से हो जाता है । यह भेद
कूटस्थ आत्मा का किया हुआ नहीं है ]
यथा चेतन आभासः कूटस्थे भ्रान्तिकल्पितः ।
अचेतनो घटादिश्च तथा तत्रैव कल्पितः ॥४६॥
जैसे चेतन आभास कूटस्थ में भ्रान्ति से कल्पित है,
ठीक इसी तरह अचेतन घटादि भी उसी कूटस्थ में भ्रान्ति
से कल्पित है ।
भाव यह है कि यह तो ठीक है कि चेतन और अचेतन के
विभाग का कारण कूटस्थ तत्व नहीं है, परन्तु अचेतन पदार्थों
की कल्पना का अधिष्ठान तो वह ठीक वैसे ही है जैसे कि यह
चिदाभास की कल्पना का अधिष्ठान है । इस कारण से अचे-
तनों में भी आत्मा की सत्ता को मानना पड़ता है ।
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तत्तेदन्ते अपि स्वत्वमिव त्वमहमादिषु ।
सर्वत्रानुगते तेन तयोरप्यात्मतेति चेत् ॥४७॥
ते आत्मत्वेऽप्यनुगते तत्तदन्ते ततस्तयोः ।
आत्मत्वं नैव संभाव्यं सम्यक्त्वादेर्यथा तथा ॥४८॥
शंका होती है कि—यदि स्वपन और आत्मा एक ही पदार्थ
हैं तो यह बताओ कि—त्वम् [तू] अहम् [मैं] आदि में
सर्वत्र रहने वाले स्वपन को जैसे तुम आत्मा मानते हो इसी
प्रकार सर्वत्र अनुगत तत्ता और इदन्ता [वह और यहपने] को
भी तुम आत्मा क्यों नहीं मान लेते हो ?॥४७॥ इसका समा-
धान—वे तत्ता और इदन्ता तो आत्मत्व रूपी जाति में भी
रहते हैं। यों आत्मा में तथा आत्मा से अन्यत्र भी रहने के
कारण इन को ठीक इसी प्रकार आत्मरूप नहीं माना जा सकता
जैसे कि सम्यक्पन आदि को आत्मा नहीं मानते हैं। ['आत्मत्व
सम्यक् है' 'आत्मत्व असम्यक् है' इस व्यवहार के प्रताप से
आत्मत्व में भी अनुवृत्त हुए हुए सम्यक्त्व और असम्यक्त्व
को जैसे कोई आत्मा नहीं मानता, इसी प्रकार आत्मा में रहने
वाली इन तत्ता और इदन्ता को आत्मा नहीं मान सकते हैं]
तत्तेदन्ते स्वतान्यत्वे त्वन्ताहन्ते परस्परम् ।
प्रतिद्वन्द्वितया लोके प्रसिद्धे नास्ति संशयः ॥४९॥
तत्ता और इदन्ता [वह और यह] स्वत्व तथा अन्यत्व
[खुद और दूसरा] त्वन्ता और अहन्ता [तू और मैं] ये परस्पर
प्रतिद्वन्द्वी [विरोधी] रूप से प्रसिद्ध हैं। इन में तो कोई संशय
ही नहीं है।
१४२ पञ्चदशी
अन्यतायाः प्रतिद्वन्द्वी स्वयं कूटस्थ इष्यताम् ।
त्वन्तायाः प्रतियोग्येपोऽहमित्यात्मनि कल्पितः ॥५०॥
अन्यता [दूसरेपन] का प्रतिद्वन्द्वी [प्रतियोगी] जो स्वयं
[खुदपन] है उस को तो कूटस्थ मानना चाहिये । त्वन्ता का
प्रतियोगी जो कि अहम् है [जिस को चिदाभास कहा जाता है]
वह तो कूटस्थ आत्मा में कल्पित कर लिया हुआ है ।
अहन्तास्वत्वयोर्भेदे रूप्यतेदन्तयोरिव ।
स्पष्टेऽपि मोहमापन्ना एकत्वं प्रतिपेदिरे ॥५१॥
रूप्यता और इदन्ता में जिस तरह का भेद है, उसी तरह
का भेद अहन्ता और स्वत्व में भी स्पष्ट ही है, तो भी भ्रान्त
लोगों ने इन्हें एक ही मान लिया है। [तात्पर्य यह है कि जीव
और कूटस्थ का भेद होने पर भी, सब किसी को इस बात का
ज्ञान न होने का कारण तो यह है कि बुद्धि का साक्षी जो
कूटस्थ है उसका प्रत्यक्ष बुद्धि से नहीं हो सकता, इस कारण
'अहं' इस शब्द से जोकि जीव और कूटस्थ दोनों प्रतीत हो
रहे हैं उन दोनों को भ्रान्ति से एक मान लिया गया है।]
तादात्म्याध्यास एवात्र पूर्वोक्ताविद्यया कृतः ।
अविद्यायां निवृत्तायां तत्कार्यं विनिवर्तते ॥५२॥
[जीव और कूटस्थ की एकता का जो भ्रम हो गया है अब
उस का कारण बताया जाता है] 'अनादिरविवेकोऽयम्' इस २५ वें
श्लोक में जिस अविद्या का कथन किया है, उस अविद्या ने ही
तादात्म्याध्यास [एकत्व का भ्रम] कर रक्खा है। यह अविद्या
जब निवृत्त हो जाती है तब अविद्या का
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भी] भाग जाता है । तात्पर्य यह कि जो ज्ञान अविद्या को
हटाता है उस ज्ञान से ही यह तादात्म्याध्यास [एकत्व भ्रम]
भी निवृत्त हो जाता है ।
अविद्यावृतितादात्म्ये विद्ययैव विनश्यतः ।
विक्षेपस्य स्वरूपं तु प्रारब्धक्षयमीक्षते ॥५३॥
अविद्या का उत्पन्न किया हुआ आवरण और तादात्म्य ये
दोनों तो विद्या [ज्ञान] से ही नष्ट हो जाते हैं । परन्तु विक्षेप
का जो स्वरूप है यह तो प्रारब्धक्षय की वाट देखा ही करता है।
शंका यह है कि—अविद्या का कार्य होने से, अविद्या के
हटते ही, अध्यास भी हट जाता है, यह कहना ठीक नहीं।
क्योंकि ब्रह्मात्मैकत्वविद्या जब उत्पन्न हो जाती है, तब भी
अविद्या के कार्य देहादि तो दीखते ही रहते हैं । इसका समा-
धान यह है कि—केवल अविद्या से उत्पन्न होने वाले जो
आवरण और तादात्म्य हैं वे तो विद्या [ज्ञान] के उत्पन्न होते
ही निवृत्त हो जाते हैं । परन्तु जिस विक्षेप के बनने में अकेली
अविद्या ही नहीं किन्तु कर्म और अविद्या दोनों मिलकर कारण
होते हैं वह 'विक्षेप' तो तब तक बना ही रहेगा, जब तक कि
भोग के द्वारा उस विक्षेप को बनाने वाले प्रारब्ध कर्म पूरे पूरे
क्षीण नहीं हो जायेंगे । तात्पर्य यह है कि अकेली अविद्या के
नष्ट होने से ही विक्षेप नष्ट नहीं होगा, किन्तु कर्म और अविद्या
दोनों ही जब नष्ट हो चुकेंगे तभी इस 'विक्षेप' की निवृत्ति होगी।
उपादाने विनष्टेऽपि क्षणं कार्यं प्रतीक्षते ।
इत्याहुस्तार्किका स्तद्वदस्माकं किं न संभवेत् ॥५४॥
फिर वे कर्म बने भी रहें, परन्तु जब विक्षेप का उपादान
१४४ पञ्चदशी
फिर वे कर्म बने भी रहें, परन्तु जब विक्षेप का उपादान
(अविद्या) ही नष्ट हो गया तब विक्षेप रूपी कार्य कैसे बना रह
जाता है ? सो बताओ ? इसका उत्तर न्यायसिद्धान्त के अनु-
सार दिया जाता है] उपादान के नष्ट हो जाने पर भी क्षणभर
कार्य ठहरा रहता है। [कार्यकारणभाव को सिद्ध करने के
लिये] यह बात तार्किकों ने मानी है। फिर ऐसा ही हमारे
सिद्धान्तों में क्यों नहीं हो सकता है।
तन्तूनां दिनसंख्यानां तैस्तादृक् क्षण ईरितः ।
भ्रमस्यासंख्यकल्पस्य योग्यः क्षण इहेष्यताम् ॥५५॥
जिन तन्तुओं की अवस्था दिनों में गिनी जा सकती है
उनकी अवस्था के अनुसार ही उनका क्षण भी उन्होंने छोटा सा
माना है। परन्तु असंख्य कल्पों की आयु वाले इस भ्रम का
क्षण तो इसी अनुपात से कुछ लम्बा होना ही चाहिये।
ऐसी अवस्था में यह आक्षेप ठीक नहीं है कि तार्किकों ने
तो कार्य को क्षणमात्र रहनेवाला माना है। उनके विपरीत तुम
कार्य को चिरकाल तक रहने वाला क्यों मानते हो ? देखो
कि यह संसार अनादिकाल से चला आ रहा है। कुम्हार
जब अपने चक्र को घुमाकर छोड़ देता है, तब वह पीछे भी
चिरकाल तक घूमा ही करता है। इसी प्रकार अनादि काल के
संस्कारों की प्रबलता से यह विक्षेप भी कुछ दिनों तो बिना
चलाये भी चलता ही रहेगा। वह ज्ञान होते ही तुरन्त नष्ट
नहीं हो जायगा।
विना क्षोदक्षमं मानं तैर्वृथा परिकल्प्यते ।
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यो वदतां किं नु दुःशकम् ॥५६॥
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जो प्रमाण क्षोद अर्थात् विचार को सह लेते हैं—विचार
करने पर जिनका निर्णय उलट पुलट नहीं हो जाता—उन
प्रमाणों के बिना ही उन तार्किकों ने तो मिथ्या की कल्पना कर
रक्खी है, परन्तु श्रुति [ तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ
संपत्स्ये ] युक्ति [ चक्र भ्रमादि के दृष्टान्त ] तथा विद्वान् लोगों के
अनुभव रूपी प्रमाणों के सहारे से ही बोलने वाले हमको
क्या दुःशक है । [ तात्पर्य यह है कि तार्किकों में और हममें
इतना भेद है कि वे तो विचारसह प्रमाण के बिना ऐसा कहते
हैं तथा हम श्रुति, युक्ति और विद्वदनुभव के आधार से ऐसा
बोलते हैं । ]
आस्तां दुस्तार्किकैः साकं विवादः प्रकृतं ब्रुवे ।
स्वाह्वयोः सिद्धमेकत्वं कूटस्थपरिणामिनोः ॥५७॥
दुस्तार्किकों के साथ विवाद को यहीं छोड़कर अब हम
प्रकृत पर आते हैं । स्व जो कूटस्थ है तथा अहं जो परिणामी
है उन दोनों की एकता [ भ्रान्तिसे ] हो जाती है, यह बात तो
सिद्ध की जा चुकी है ।
भ्राम्यन्ते पण्डितम्मन्याः सर्वे लौकिकतैर्थिकाः ।
अनादृत्य श्रुतिं मौर्यात् केवलां युक्तिमाश्रिताः ॥५८॥
जितने भी लौकिक और तैर्थिक लोग हैं, वे सभी अपने
आप को महाज्ञानी मानते हैं और भ्रम में ही गोते खाया करते
हैं । ये लोग अपनी मूर्खता से श्रुति का अनादर करके केवल
युक्ति पर निर्भर हो गये हैं । [ इसी कारण से कूटस्थ और
जीव की जो भ्रान्तिसिद्ध एकता है उसको वे पहचानते नहीं
१४६ पञ्चदशी
हैं। यदि वे श्रुति के तात्पर्य का विचार करते तो इस भ्रान्ति-
सिद्ध एकता को पहचान जाते । ]
पूर्वापरपरामर्शविकलास्तत्र केचन ।
वाक्याभासान् स्वस्वपक्षे योजयन्त्यप्यलज्जया ॥५९॥
उन्हीं लोगों में से कुछ लोग पूर्वापर का विचार तक
नहीं करते हैं और निर्लज्ज होकर श्रुति के वाक्याभासों को
अपने अपने पक्ष में लगाया भी करते हैं।
कूटस्थादिशरीरान्तसंघातस्यात्मतां जगुः।
लोकायताः पामराश्च प्रत्यक्षाभासमाश्रिताः ॥६०॥
प्रत्यक्षाभास का आश्रय लिये हुए लोकायतों ने तथा पामर
[ महामूर्ख ] लोगों ने, कूटस्थ से लेकर शरीर पर्यन्त अनेक
पदार्थों के इस संघात [जमघट] को ही आत्मा कह डाला है।
श्रौतीकर्तुं स्वपक्षं ते कोशमन्नमयं तथा ।
विरोचनस्य सिद्धान्तं प्रमाणं प्रतिजज्ञिरे ॥६१॥
उन्होंने अपने पक्ष पर श्रुति की मोहर लगाने के लिये,
अन्नमय कोश का प्रतिपादन करनेवाले 'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः'
इस वाक्य का उद्धरण किया है। तथा विरोचन के 'आत्मैव
देहमयः' इस सिद्धान्त को प्रमाण मान लिया है [परन्तु प्रकरण-
विरोध के कारण ऐसा उपपादन करने का सामर्थ्य उनमें नहीं है]।
जीवात्मनिर्गमे देहमरणस्यात्र दर्शनात् ।
देहातिरिक्त एवात्मेत्याहुर्लोकायताः परे ॥६२॥
जीवात्मा जब निकल जाता है तब यह देह मर जाता है।
इस कारण आत्मा देह से भिन्न है, यह बात दूसरे लोकायत
मानते हैं।
चित्रदीपप्रकरणम् १४७
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प्रत्यक्षत्वेनाभिमतांधीं देहातिरेकिणम् ।
गमयेदिन्द्रियात्मानं वच्मीत्यादिप्रयोगतः ॥६३॥
अहं वच्मि अहं पश्यामि=मैं बोलता हूँ मैं देखता हूँ इत्यादि
प्रयोगों से प्रतीत होता है कि प्रत्यक्ष मानी हुई यह अहंबुद्धि,
देह से भिन्न इन्द्रियों को आत्मा बता रही है ।
वागादीनामिन्द्रियाणां कलहः श्रुतिषु श्रुतः ।
तेन चैतन्यमेतेषा मात्मत्वं तत एव हि ॥६४॥
श्रुतियों में वाणी आदि इन्द्रियों का कलह सुना गया है ।
इस कारण ये इन्द्रियाँ चेतन है । चेतन होने के कारण ही ये
इन्द्रियां आत्मा भी हैं ।
हैरण्यगर्भाः प्राणात्मवादिनस्त्वेवमूचिरे ।
चक्षुराद्यक्षलोपेऽपि प्राणसत्वे तु जीवति ॥६५॥
प्राणात्मवादी हैरण्यगर्भ तो यह कहते हैं कि चक्षु आदि
इन्द्रियाँ जब टूट फूट भी जाती हैं, तब भी प्राण के रहने पर
जीता ही रहता है, इस कारण प्राण ही आत्मा है ।
प्राणो जागर्ति सुप्तेऽपि प्राणश्रैष्ठ्यादिकं श्रुतम् ।
कोशः प्राणमयः सम्यग्विस्तरेण प्रपञ्चितः ॥६६॥
प्राणादय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति (प्रश्न ४-३) इसमें कहा
गया है कि सो जाने पर भी प्राण जागता रहता है । तदेदुक्थम्
(छा० १-७-५) इसमें प्राण को श्रेष्ठ बताया गया है । अन्यो-
ऽन्तर आत्मा प्राणमयः (तै० २-२) इसमें प्राणमय कोश का
कथन विस्तार से किया गया है। यों प्राण को आत्मा सिद्ध
करने वाले अनेक श्रौत लिंग हैं ।
१४८ पञ्चदशी
मन आत्मेति मन्यन्त उपासनपरा जनाः ।
प्राणस्याभोक्तृता स्पष्टा भोक्तृत्वं मनसस्ततः ॥६७॥
उपासना करने वाले मन को ही आत्मा मानते हैं। क्योंकि
प्राण का अभोक्ता पन तो सबको विदित ही है। इस कारण
मन ही भोक्ता है (और वही आत्मा है)।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
श्रुतो मनोमयो कोश स्तेनात्मेतीरितं मनः ॥६८॥
मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। तस्माद्वा
एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः (तै० २-३) इस
श्रुति में मनोमय कोश का वर्णन भी आता है। इसी से मन
को आत्मा कहा जाता है।
विज्ञान मात्मेति पर आहुः क्षणिकवादिनः ।
यतो विज्ञानमूलत्वं मनसो गम्यते स्फुटम् ॥६९॥
दूसरे क्षणिकवादी बौद्ध लोग विज्ञान को ही आत्मा कहते
हैं। क्योंकि यह मन विज्ञानमूलक है, यह तो सभी को प्रत्यक्ष
होता है।
अहंवृत्ति रिदंवृत्ति रित्यन्तःकरणं द्विधा ।
विज्ञानं स्यादहंवृत्ति रिदंवृत्तिर्मनो भवेत् ॥७०॥
अन्तःकरण दो प्रकार का होता है—एक 'अहंवृत्ति' दूसरा
'इदंवृत्ति'। विज्ञान अर्थात् बुद्धि को 'अहंवृत्ति' कहते हैं, मन को
'इदंवृत्ति' कहा जाता है। इस प्रकार एक होने पर भी वृत्ति-
भेद के कारण 'मन' और 'विज्ञान' कहाने लगता है।
चित्रदीपप्रकरणम् १४९
चित्रदीपप्रकरणम् १४९
[जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान होता है, तब मन उत्पन्न
हो जाता है। जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान नहीं होता जब केवल
अपने आपे का बोध ही रहता है तब बुद्धि का राज्य रहता
है । बुद्धि का काम आपे को जानना है मन का काम बाहर
के पदार्थों की देख भाल करना है !]
अहंप्रत्ययबीजत्व मिदंवृत्तेरिति स्फुटम् ।
अविदित्वा स्वमात्मानं बाह्यं वेत्ति न तु क्वचित् ॥७१॥
[मन और विज्ञान का कार्यकारणभाव इस श्लोक में
बताया गया है ] यह ‘इदंवृत्ति’ [ बाहर के पदार्थों की
प्रतीति ] ‘अहं प्रत्यय’ से [ मैं इस ज्ञान के अन्दर से ] उत्पन्न
हुआ करती है । जभी तो अपने आपे को पहले बिना जाने
कहीं भी कोई बाह्य पदार्थ को नहीं जानता। [तात्पर्य यह कि
पहले अहंवृत्ति [ मैं भाव ] उदय हो लेती है, तब पीछे से
इदंवृत्ति पैदा हुआ करती है। यों इन दोनों में कार्य कारण
भाव है।]
क्षणे क्षणे जन्मनाशावहंवृत्तेर्मितौ यतः ।
विज्ञानं क्षणिकं तेन, स्वप्रकाशं स्वतो मितेः ॥७२॥
इस अहंवृत्ति का जन्म और नाश क्षण क्षण में होता
रहता है । कभी यह पैदा होती है, क्षण भर बाद फिर मर
जाती है । यों अनुभव से विज्ञान (अहंवृत्ति) की क्षणिकता
सिद्ध हो जाती है । अपने से ही प्रमित होने के कारण यह
विज्ञान स्वयं प्रकाश भी है । [क्योंकि यह ज्ञान ही अपने
आपको जानता है, इसलिये यह स्वयं प्रकाश है ।]
१५० पञ्चदशी
विज्ञानमयकोशोयं जीव इत्यागमा जगुः ।
सर्वसंसार एतस्य जन्मनाशसुखादिकः ॥७३॥
'तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तरआत्मा विज्ञानमयः' (तै० २-४)
'विज्ञानं यज्ञं तनुते' (तै० २-५) इत्यादि आगमों ने विज्ञानमय
कोष को ही 'जीव' कहा है । जन्म, नाश तथा सुखादि नामक
यह सम्पूर्ण संसार इस विज्ञानमय कहलाने वाले जीव का
ही तो है ।
विज्ञानं क्षणिकं नात्मा विद्युदभ्रनिमेषवत् ।
अन्यस्यानुपलब्धत्वाच्छून्यं माध्यमिका जगुः ॥७४॥
माध्यमिक नाम के शून्यवादी बौद्ध तो कहते हैं कि—
बिजली, बादल, तथा निमेष के समान क्षण भर में नष्ट हो
जाने वाला क्षणिक विज्ञान, आत्मा नहीं है। इसके अतिरिक्त
और तो कुछ दीखता ही नहीं, इसलिये 'शून्य' ही आत्मा है ।
असदेवेदमित्यादाविदमीव श्रुतं ततः ।
ज्ञानज्ञेयात्मकं सर्वं जगद् भ्रान्तिप्रकल्पितम् ॥७५॥
निरधिष्ठानविभ्रान्ते रभावादात्मनोऽस्तिता ।
शून्यस्यापि ससाक्षित्वा दन्यथा नोक्तिरस्य ते ॥७६॥
उन शून्यवादियों का यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि बिना
अधिष्ठान का तो कोई भ्रम होता ही नहीं। इस कारण से इस
भ्रान्त जगत्कल्पना के अधिष्ठान आत्मा को तो मानना ही पड़ता
है। शून्यवादी का यह शून्य भी तो ससाक्षिक ही होना
चाहिये । [इस शून्य का साक्षी अर्थात् शून्य को जानने वाला
भी तो कोई होना ही चाहिये] यदि उस साक्षी को न मानोगे
[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १५१
[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १५१
तो तुम्हारे [बौद्ध के] मत में शून्य का कहना भी सिद्ध नहीं
हो सकेगा। [यों शून्य को जानने वाला तत्व तो तुम्हें भी
मानना ही पड़ेगा।]
अन्यो विज्ञानमयत आनन्दमय आन्तरः।
अस्तीत्येवोपलब्धव्य इति वैदिकदर्शनम् ॥७७॥
[सभी को मना करते जाते हो फिर आत्मा क्या चीज
है? इस बात का उत्तर इस श्लोक में दिया है] तस्माद्वा एतस्मा
द्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः (तै० २-५) अस्तीत्येवोपलब्ध-
व्यस्तत्वभावेन (क० २-६-१३) इन श्रुतियों के आधार से इन
सब से भिन्न आनन्दमय आत्मा मानना चाहिये। ऐसा वैदिक
सिद्धान्त है।
अणुर्महान् मध्यमो वेत्येवं तत्रापि वादिनः।
बहुधा विवदन्ते हि श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥७८॥
['आत्मस्वरूप में ही नहीं उसके परिमाण में भी लोगों
के अनेक मत हैं' यह अब दिखाया जाता है] श्रुति और युक्ति
के सहारे से वादी लोग आत्मा को अणु, महान् या मध्यम
बताते हैं और आपस में एक दूसरे से अनेक प्रकार के विवाद
करते हैं।
अणुं वदन्त्यन्तरालाः सूक्ष्मनाडीप्रचारतः ।
रोम्णः सहस्रभागेन तुल्यासु प्रचरत्ययम् ॥७९॥
अणुत्ववादी लोग सूक्ष्म नाडियों में प्रचार के कारण
आत्मा को अणु कहते हैं। रोम के सहस्र भाग के तुल्य जो
सूक्ष्म नाडियां हैं उनमें भी वह घूमा करता है। [ऐसी सूक्ष्म
नाडियों में अणु होने के बिना आत्मा का प्रचार कैसे हो ?]
१५२ पञ्चदशी
अणोरणीयानेषोऽणुः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं त्विति ।
अणुत्वमाहुः श्रुतयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥८०॥
अणोरणीयान् महतो महीयान् (कठ० १-२-२०) एषोऽणुरात्मा
चेतसा वेदितव्यः सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं त्विति (मुण्ड० ३-१-९) इत्यादि
श्रुतियों में अनेक स्थान पर आत्मा को अणु से भी अणीयान्
तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर कहा गया है ।
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ।
भागो जीवः स विज्ञेय इति चाहापरा श्रुतिः ॥८१॥
वालाग्र का सौवां भाग लिया जाय, फिर उसके भी सौवें
भाग की कल्पना की जाय तो उस अत्यन्त छोटे भाग को ही जीव
जानना चाहिये । यह भी एक श्रुति में कहा है ।
दिगम्बरा मध्यमत्व माहुरापादमस्तकम् ।
चैतन्यव्याप्तिसंदृष्टे रानखाग्रश्रुतेरपि ॥८२॥
दिगम्बर [जैन] लोग आत्मा को मध्यम परिमाण वाला
मानते हैं। क्योंकि चैतन्य की व्याप्ति पैर से लेकर चोटी पर्यन्त
देखी जाती है । स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यः इस श्रुति से भी
वे आत्मा को मध्यम परिमाण वाला सिद्ध करते हैं।
सूक्ष्मनाडीप्रचारस्तु सूक्ष्मैरवयवैर्भवेत् ।
स्थूलदेहस्य हस्ताभ्यां कञ्चुकप्रतिमोकवत् ॥८३॥
आत्मा को मध्यम परिमाण वाला मानने पर भी उस
आत्मा का सूक्ष्म नाडियों में प्रचार तो सूक्ष्म अवयवों के द्वारा
ठीक इसी प्रकार हो जायगा. जैसे कि देह के हाथ आदि अवयव
जब कुरते में घुस जाते हैं तब वह देह का ही कुरते में घुसना
चित्रदीपप्रकरणम् १५३
चित्रदीपप्रकरणम् १५३
माना जाता है [आत्मा के अवयव जब सूक्ष्म नाडियों में
प्रचार करेंगे तब उसे आत्मा का ही प्रचार मान लिया जायगा।]
न्यूनाधिकशरीरेषु प्रवेशोऽपि गमागमैः ।
आत्मांशानां भवेत्, तेन मध्यमत्वं विनिश्चितम् ॥८४॥
आत्मा का जब एक नियत मध्यम परिमाण मानेंगे तब
जब वह छोटे बड़े शरीरों में प्रवेश करेगा, उस समय आत्मा
के कुछ अवयव घट बढ़ जाया करेंगे। फिर जैसे देह छोटे
बड़े हो जाते हैं इसी प्रकार आत्मा के अंश भी घट बढ़ जायँगे।
यों आत्मा तो मध्यम परिमाण ही है ऐसा उन्होंने अपने मन
को समझा रक्खा है।
सांशस्य घटवन्नाशो भवत्येव, तथा सति ।
कृतनाशाकृताभ्यागमयोः को वारको भवेत् ॥८५॥
आत्मा को सावयव मानने पर घटादि की तरह उसका
नाश होगा ही। फिर कृतनाश और अकृताभ्यागम नाम के
दोषों को हटानेवाला कौन होगा उसे बताओ ? [किये हुए
पुण्य पाप जब बिना भोग दिये नष्ट हो जाते हैं तब उसे 'कृत-
नाश' कहते हैं। जब तो बिना किये ही कुछ भोगना पड़ जाता
है तब वह 'अकृताभ्यागम' कहा जाता है। आत्मा को अनित्य
मानने में ये दो दोष आते हैं।]
तस्मादात्मा महानेव नैवाणुर्नापि मध्यमः ।
आकाशवत् सर्वगतो निरंशः श्रुतिसम्मतः ॥८६॥
यों परिशेष से यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा तो
महान् [विभु=व्यापक] ही है। यह न तो अणु है और न यह
मध्यम परिमाण वाला ही है। आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः
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निष्कलं निष्क्रियम् [ श्वेता० ६-१९ ] इत्यादि श्रुतियें आत्मा को
आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक तथा निरवयव मानती हैं ।
इत्युक्त्वा तद्विशेषे तु बहुधा कलहं ययुः ।
अचिद्रूपोऽथ चिद्रूपश्चिदचिद्रूप इत्यपि ॥८७॥
यों आत्मा की विभुता तो सिद्ध हो गयी । परन्तु
उसके विशेष धर्मों के विषय में भी अनेक विवाद चलते हैं ।
कोई कहता है आत्मा 'अचिद्रूप' है। दूसरा आत्मा को 'चिद्रूप'
मानता है । कोई उसे चिदचिद्रूप भी बता देता है ।
प्राभाकरास्तार्किकाश्च प्राहुरस्याचिदात्मताम् ।
आकाशवद् द्रव्यमात्मा शब्दवत् तद्गुणश्चितिः ॥८८॥
प्राभाकर और तार्किक दोनों ही इसको अचिद्रूप बताते
हैं। वे कहते हैं कि—आत्मा भी आकाश की तरह एक द्रव्य है।
शब्द जैसे आकाश का गुण है इसी प्रकार चिति [ चैतन्य ]
उस. आत्मा का गुण है। [ इस चैतन्य गुण ने ही इस आत्मा
को पृथिवी आदि सब से भिन्न कर दिया है ] ।
इच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च धर्माधर्मौ सुखासुखे ।
तत्संस्काराश्च तस्यैते गुणाश्चितिवदीरिताः ॥८९॥
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्माधर्म, सुख, दुःख, तथा उनके
संस्कार ये सब चेतना के समान ही आत्मा के गुण हैं ।
आत्मनो मनसा योगे स्वादृष्टवशतो गुणाः ।
जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते सुषुप्तेऽदृष्टसंक्षयात् ॥९०॥
आत्मा का जब मन से योग हो जाता है, तब अपने अदृष्ट
के प्रताप से ये गुण उत्पन्न हो जाते हैं, तथा सुषुप्ति के समय
जब अदृष्ट का क्षय हो जाता है तब ये गुण नष्ट हो जाते हैं ।
चितिमत्त्वाच्चेतनोऽयमिच्छाद्वेषप्रयत्नवान् ।
स्याद्धर्माधर्मयोः कर्ता भोक्ता दुःखादिमत्त्वतः ॥९१॥
चिति नामक गुणवाला होने से यह चेतन है [ यों स्वयं
अचिद्रूप होने पर भी इसको चेतन मान लिया जाता है ]
चेतन होने का एक और भी प्रमाण है कि इसमें इच्छा, द्वेष
तथा प्रयत्न नाम के गुण विद्यमान हैं। यह आत्मा धर्माधर्म
का कर्ता है। दुःखादिवाला होने से इसे भोक्ता माना जाता है
[ यों उसमें ईश्वर तत्व से विलक्षणता पायी जाती है। ]
यथात्र कर्मवशतः कादाचित्कं सुखादिकम् ।
तथा लोकान्तरे देहे कर्मणेच्छादि जन्यते ॥९२॥
जैसे कर्म के वश यहाँ ( इस लोक में ) कभी कभी होने
वाले सुखादि होते हैं, इसी प्रकार लोकान्तर में [ मिले हुए ]
दूसरे देह में भी, कर्म से ही इच्छादि हो जाते हैं।
विभु होने पर आत्मा लोकान्तर गमन आदि कैसे करेगा ?
इसका समाधान यह है कि—जैसे इस देह में कर्म के वश
इच्छा आदि उत्पन्न होते हैं तो इसे यहाँ आत्मा का रहना मान
लिया जाता है, इसी प्रकार कर्म के वश जब लोकान्तर में
देहान्तर मिलता है तब उस देहावच्छिन्न आत्मा के प्रदेश में
ही सुखादि उत्पन्न होने लगते हैं और वहाँ आत्मा का गमनादि
मान लिया जाता है। वस्तुतः आत्मा में गमनादि कुछ
नहीं होता।
एवं च सर्वगस्यापि संभवेतां गमागमौ ।
कर्मकाण्डः समग्रोऽत्र प्रमाणमिति तेऽवदन् ॥९३॥
इस प्रकार सर्वग [ सर्वत्र व्यापक ] आत्मा का भी आना
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जाना संभव हो जाता है। आत्मा में कर्तृत्वादि धर्म रहते हैं
इस बात में सम्पूर्ण कर्मकाण्ड प्रमाण है ऐसा वे कहते हैं।
[ यदि आत्मा कर्ता नहीं है तो कर्मकाण्ड की रचना क्यों की
गयी है ? ]
आनन्दमयकोशो यः सुषुप्तौ परिशिष्यते ।
अस्पष्टचित् स आत्मैषां पूर्वकोशोऽस्य ते गुणाः ॥९४॥
सुषुप्ति के समय जो 'आनन्दमय कोश' शेष रह जाता है
जिसमें चेतनता अस्पष्ट रूप से रहती है, कोशों में सबसे
पहला कोश यह आनन्दमय कोश ही इन प्रभाकर आदियों का
आत्मा है। वे पूर्वोक्त इच्छा आदि इसी के गुण हैं। [ तात्पर्य
यह कि जिस आत्मा को हमने पहले आनन्दमय कहा था
इच्छादि वाला वही उनका सम्मत आत्मा है । ]
गूढं चैतन्यमुत्प्रेक्ष्य जडबोधस्वरूपताम् ।
आत्मनो ब्रुवते भाट्टाश्चिदुत्प्रेक्षोत्थितस्मृतेः ॥९५॥
कुमारिल भट्ट के अनुयायी तो इसी आत्मा के गूढ अर्थात्
अस्पष्ट चैतन्य की ऊहना कर लेते हैं फिर इसको चैतन्य और
जड उभय रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि सोकर उठे हुए पुरुष
को जो स्मृति होती है उससे चैतन्य की उत्प्रेक्षा होती है। सो-
कर उठा हुआ पुरुष जब स्मरण करता है तब उससे सुषुप्ति
के समय के चैतन्य की ऊहना कर ली जाती है।
जडो भूत्वा तदास्वाप्समिति जाड्यस्मृतिस्तदा ।
विना जाड्यानुभूतिं न कथंचिदुपपद्यते ॥९६॥
[ चैतन्य की उत्प्रेक्षा करने की उनकी परिपाटी यह है
'कि ]—सुषुप्ति के समय 'मैं जड होकर सोया पड़ा था' ऐसा