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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

कूटस्थदीपप्रकरणम् · ३३७

कूटस्थदीपप्रकरणम् · ३३७
तक किया है, ठीक इसी प्रकार देह के अन्दर भी चिदाभास
का और कूटस्थ का विवेक [ ज्ञान की चलनी से ] कर
लेना चाहिये ।
अहंवृत्तौ चिदाभासः कामक्रोधादिकासु च ।
संव्याप्य वर्तते, तप्ते लोहे वह्निर्यथा तथा ॥१८॥
तपे हुए लोहे में आग की तरह, अहंवृत्ति में और काम
क्रोधादि वृत्तियों में चिदाभास व्याप्त हुआ रहता है ।
स्वमात्रं भासयेत् तप्तं लोहं नान्यत् कदाचन ।
एवमाभाससहिता वृत्तयः स्वस्वभासिकाः ॥१९॥
तपकर लाल हुआ लोहा केवल अपने आपको ही प्रका-
शित किया करता है । अन्य किसी वस्तु को प्रकाशित करने
का सामर्थ्य उसमें नहीं होता । ठीक इसी प्रकार, आभास से
युक्त वृत्तियां भी केवल अपनी ही भासक होती हैं, दूसरे
की नहीं ।
क्रमाद् विच्छिद्य विच्छिद्य जायन्ते वृत्तयोऽखिलाः ।
सर्वा अपि विलीयन्ते सुप्तिमुर्च्छासमाधिषु ॥२०॥
जितनी भी वृत्तियां हैं, वे सब क्रमसे रुक रुक कर पैदा
हुआ करती है । जब एक वृत्ति नष्ट होजाती है तब दूसरी
वृत्ति का उदय होता है । इसी प्रकार तीसरी और चौथी आदि
वृत्तियों की उत्पत्ति को भी समझना चाहिये । सुप्ति मूर्छा और
समाधि के समय तो वे सभी वृत्तियां विलीन हो जाती हैं
फिर तो उनमें से एक भी नहीं रहजाती ।
सन्धयोऽखिलवृत्तीना मभावाश्चावभासिताः ।
निर्विकारेण येनासौ कूटस्थ इति चोच्यते ॥२१॥
२१

३३८ पञ्चदशी
सब वृत्तियों की सन्धियां [जब कि एक वृत्ति नष्ट हो कर
दूसरी उत्पन्न होने को होती है] तथा सब वृत्तियों के अभाव
[जबकि कोई भी वृत्ति नहीं रहती] जिस निर्विकार चैतन्य
से प्रकाशित [ज्ञात] होते हैं, उसीको कूटस्थ कहा जाता है ।
घटे द्विगुणचैतन्यं यथा बाह्ये तथान्तरे ।
वृत्तिष्वपि, ततस्तत्र वैशद्यं सन्धितोऽखिलम् ॥२२॥
जैसे बाह्य घट में दुगना चैतन्य [एक तो घटमात्र का
भासक चिदाभास तथा दूसरा घट की ज्ञातता का भासक
ब्रह्मचैतन्य] होता है, इसी प्रकार अन्दर की अहंकारादि वृत्तियों
में भी एक तो कूटस्थ चैतन्य रहता है, दूसरा केवल वृत्तियों का
चिदाभास होता है । यों अन्दर भी दुगना चैतन्य होता है ।
दुगना चैतन्य होने के कारण ही, इन वृत्तियों में, संधियों से
अधिक स्पष्टता आगयी है । [चैतन्य की इतनी विशदता
सन्धियों में नहीं होती, जितनी कि इन वृत्तियों में होती है ।]
ज्ञातताज्ञातते न स्तो घटवद् वृत्तिषु क्वचित् ।
स्वस्य स्वेनागृहीतत्वात् तामिस्राज्ञाननाशनात् ॥२३॥
घट में जैसे ज्ञातता और अज्ञातता होती है, वैसे वृत्तियों
में कभी भी ज्ञातता और अज्ञातता नहीं होतीं । क्योंकि अपना
आपा अपने आप से गृहीत नहीं हो सकता तथा उन वृत्तियों
के उत्पन्न होते ही उनसे अज्ञान का नाश हो जाता है । [भाव
यह है कि ज्ञान की व्याप्ति से ज्ञातता और अज्ञान की व्याप्ति
से अज्ञातता होती है । वृत्तियां स्वयंप्रकाश होती हैं, इस कारण
उनमें ज्ञान की व्याप्ति नहीं होती और 'ज्ञातता' नहीं आती । वे
वृत्तियाँ जब उत्पन्न हो जाती हैं तब वे उत्पन्न होते ही