पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४९
'सोयं देवदत्तः' इस वाक्य के 'सोऽयं' इन दोनों पदों में
जैसे भागलक्षणा [जहदजहल्लक्षणा] मानी गई है [दूसरी कोई
सी लक्षणा नहीं मानी गई] इसी प्रकार तत्वमसि आदि वाक्यों
में भी भागत्याग लक्षणा ही होती है ।
संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र संमतः ।
अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मतः ॥७५॥
[ 'गामानय' गौ को लाओ इत्यादि वाक्यों में लक्षणा न
करने पर भी वाक्यार्थबोध हो जाता है, वैसे ही इन तत्वमसि
आदि वाक्यों में भी हो जायगा। इस शंका का समाधान यह
है कि लोक में 'गामानय' इत्यादि पदों से जो आकांक्षा आदि
वाले गौ आदि पदार्थ उपस्थित होते हैं, उनका परस्पर 'संसर्ग'
(अन्वय) हो जाना ही जैसे वाक्यार्थ माना जाता है, 'नीलं
महत्सुगन्ध्युत्पलम्' इत्यादि में नीलता आदि विशिष्ट उत्पल (फूल)
को वाक्यार्थ माना जाता है, इस तरह ] इन महावाक्यों में
'संसर्ग' या 'विशिष्ट' कोई भी वाक्यार्थ नहीं माना जाता।
किन्तु विद्वान् लोग अखण्ड एकरस पदार्थ को वाक्यार्थ मानते
हैं [इस कारण लक्षणा का आश्रय कर लेना चाहिए ] ।
प्रत्यग्बोधो य आभाति सोऽद्वयानन्दलक्षणः ।
अद्वयानन्दरूपश्च प्रत्यग्बोधैकलक्षणः ॥७६॥
अखण्ड एकरस वाक्यार्थ यों होता है—जो कि प्रत्यग्बोध
[या सर्वान्तर चिदात्मा] प्रतीत हो रहा है [जो बुद्धि आदि का
साक्षी होकर भास रहा है] वही तो अद्वितीय आनन्दरूप पर-
मात्मा है, तथा वह जो अद्वितीय आनन्दरूप परमात्मा
बताया जाता है वह यह चिदेकरस आत्मा ही तो है।
२५० पञ्चदशी
इत्थमन्योन्यतादात्म्यप्रतिपत्तिर्यदा भवेत् ।
अब्रह्मत्वं त्वमर्थस्य व्यावर्तते तदैव हि ॥७७॥
तदर्थस्य च पारोक्ष्यम्, यद्येवं किं ततः शृणु ।
पूर्णानन्दैकरूपेण प्रत्यग्बोधोऽवतिष्ठते ॥७८॥
जब किसी को इस प्रकार [व्यतिहार से—लौट फेर से]
तादात्म्य का ज्ञान हो जायगा,तब एक तो यह होगा कि त्वमर्थ
में जो अब्रह्मता आ गई थी [भ्रान्ति से उसको जो अब्रह्म
समझ लिया गया था] वह तुरन्त ही भाग जायगी । दूसरे
यह होगा कि तदर्थ में जो परोक्षता आ गई थी [वह जो परोक्ष
ज्ञान का ही विषय हो गया था] वह भी उसी क्षण नष्ट हो
जायगी । ऐसा होने पर भी क्या होगा ? सो इस प्रश्न का उत्तर
भी सुन लो, कि—यह जो अभी तक प्रत्यग्बोध ही था यही
अब पूर्णानन्द बन बैठता है ।
एवं सति महावाक्यात् परोक्षज्ञानमीर्यते ।
यैस्तेषां शास्त्रसिद्धान्तविज्ञानं शोभतेतराम् ॥७९॥
इतना सब सुन चुकने पर भी जो लोग यह कहते ही जाते
हैं कि महावाक्य से परोक्षज्ञान ही होता है, [वे सिद्धान्त के
रहस्य को जानते ही नहीं] सिद्धान्त-ज्ञानरहित उनकी बात सुन
कर हमें तो हँसी आती है ।
आस्तां शास्त्रस्य सिद्धान्तो युक्त्या वाक्यात् परोक्षधीः ।
स्वर्गादिवाक्यवन्नैवं दशमे व्यभिचारतः ॥८०॥
शास्त्र के सिद्धान्त की बात को छोड़ दो [उससे हमें कुछ
मतलब नहीं] युक्ति से यही सिद्ध होता है कि—वाक्य से तो-