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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 160

१४२ पञ्चदशी
अन्यतायाः प्रतिद्वन्द्वी स्वयं कूटस्थ इष्यताम् ।
त्वन्तायाः प्रतियोग्येपोऽहमित्यात्मनि कल्पितः ॥५०॥
अन्यता [दूसरेपन] का प्रतिद्वन्द्वी [प्रतियोगी] जो स्वयं
[खुदपन] है उस को तो कूटस्थ मानना चाहिये । त्वन्ता का
प्रतियोगी जो कि अहम् है [जिस को चिदाभास कहा जाता है]
वह तो कूटस्थ आत्मा में कल्पित कर लिया हुआ है ।
अहन्तास्वत्वयोर्भेदे रूप्यतेदन्तयोरिव ।
स्पष्टेऽपि मोहमापन्ना एकत्वं प्रतिपेदिरे ॥५१॥
रूप्यता और इदन्ता में जिस तरह का भेद है, उसी तरह
का भेद अहन्ता और स्वत्व में भी स्पष्ट ही है, तो भी भ्रान्त
लोगों ने इन्हें एक ही मान लिया है। [तात्पर्य यह है कि जीव
और कूटस्थ का भेद होने पर भी, सब किसी को इस बात का
ज्ञान न होने का कारण तो यह है कि बुद्धि का साक्षी जो
कूटस्थ है उसका प्रत्यक्ष बुद्धि से नहीं हो सकता, इस कारण
'अहं' इस शब्द से जोकि जीव और कूटस्थ दोनों प्रतीत हो
रहे हैं उन दोनों को भ्रान्ति से एक मान लिया गया है।]
तादात्म्याध्यास एवात्र पूर्वोक्ताविद्यया कृतः ।
अविद्यायां निवृत्तायां तत्कार्यं विनिवर्तते ॥५२॥
[जीव और कूटस्थ की एकता का जो भ्रम हो गया है अब
उस का कारण बताया जाता है] 'अनादिरविवेकोऽयम्' इस २५ वें
श्लोक में जिस अविद्या का कथन किया है, उस अविद्या ने ही
तादात्म्याध्यास [एकत्व का भ्रम] कर रक्खा है। यह अविद्या
जब निवृत्त हो जाती है तब अविद्या का