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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

उपेक्ष्य तत् तीर्थयात्राजपादीनेव कुर्वताम् ।

३९६ पञ्चदशी

उपेक्ष्य तत् तीर्थयात्राजपादीनेव कुर्वताम् ।
पिंडं समुत्सृज्य करं लेढीति न्याय आपतेत् ॥ १३० ॥
[जो निर्गुणोपासना अपरोक्षज्ञान को सिद्ध कर सकती है]
उसे छोड़ कर जो अविचारी लोग तीर्थाटन और जप तप ही
करते रहते हैं,उनका परिश्रम तो उस जैसा ही है जो हाथ में से
गुडपिण्ड को फेंक कर हाथ को ही चाट रहा हो [अर्थात् उनका
परिश्रम वृथा होता है] ।
उपासकानामध्येवं विचारत्यागतो यदि ।
बाढं, तस्माद् विचारस्यासंभवे योग ईरितः ॥१३१॥
इस बात को तो हम भी स्वीकार करते हैं—कि आंतमतत्व
के विचारों को छोड़ कर निर्गुणोपासना करने वाले उपासक
भी इसी श्रेणी के हैं [वे गुड फेंक कर हाथ चाटने वाले के
समान ही अविचारशील हैं] इसी कारण से शास्त्रकी सम्मति तो
यही है कि जिस को विचार करना असंभव होता है उसी के
लिये योग [उपासना] का विधान किया गया है ।
बहुव्याकुलचित्तानां विचारात् तत्वधी र्नहि ।
योगो मुख्यस्ततस्तेषां धीदर्पस्तेन नश्यति ॥१३२॥
जिन पुरुषों के चित्त अत्यन्त व्याकुल हुए रहते हैं, उनको
विचार से तत्वज्ञान नहीं हो सकता । उनके लिये तो योग
ही मुख्य उपाय है । क्योंकि योग करने से उनका धीदर्प नष्ट
हो जाता है ।
अव्याकुलधियां मोहमात्रेणाच्छादितात्मनाम् ।
सांख्यनामा विचारः सन्मुख्यो झटिति सिद्धिदः॥१३३॥
जिन पुरुषों की बुद्धि व्याकुल नहीं होती है, जिनका