पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६७
जाता है तब फिर इतिहासादियों से उस के निदिध्यासन में
विक्षेप नहीं पड़ता ।
कृषिवाणिज्यसेवाद्यौ काव्यतर्कादिकेषु च ।
विक्षिप्यते प्रवृत्त्या धीस्तैस्तत्वस्मृत्यसंभवात् ॥१२४॥
खेती, व्योपार, नौकरी, काव्य तथा तर्कादि का अनुशीलन
करने पर तो उनमें प्रवृत्ति के कारण बुद्धि विक्षिप्त हो ही
जाती है । क्योंकि इनके करते हुए तत्व की स्मृति असम्भव
है । [इस कारण कृषि आदि को छोड़कर उन इतिहासादि को
स्वीकार किया गया है]
अनुसन्दधतैवात्र भोजनादौ प्रवर्तितुम् ।
शक्यतेऽत्यन्तविक्षेपाभावादाशु पुनः स्मृतेः ॥१२५॥
[शरीर यात्रा के लिये अत्यावश्यक] भोजन आदि में तो
आत्मा का अनुसन्धान (स्मरण) करते हुए भी प्रवृत्ति हो
सकती है। क्योंकि भोजनादि अन्तरंग कामों से किसी को
अत्यन्त विक्षेप नहीं होता। उसका कारण यह है कि तत्व का
स्मरण फिर तुरन्त ही हो जाता है। [भोजनादि में हमारा
मन व्यग्र नहीं होता है, यह तो शरीर करता रहता है, भोज-
नादि के समय भी तत्वस्मृति रखी जा सकती है। हाँ, मनो-
राज्य जब होगा तब वह तत्व को उलटा समझा कर ही होगा ।]
तत्वविस्मृतिमात्रान्नार्थः किन्तु विपर्ययात् ।
विपर्येतुं न कालोऽस्ति झटिति स्मरतः क्वचित् ॥१२६॥
तत्व को भूल जाने मात्र से ही अनर्थ नहीं होता। किन्तु
अनर्थ तो विपरीत ज्ञान हो जाने से होता है । जब कोई पुरुष
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तुरन्त ही आत्मतत्व का स्मरण कर लेता है उसे विपरीत ज्ञान
होने का तो कोई अवसर ही नहीं मिलता ।
तत्त्वस्मृतेरवसरो नास्त्यन्याभ्यासशालिनः ।
प्रत्युताभ्यासघातित्वाद् बलात् तत्त्वमुपेक्ष्यते ॥१२७॥
जो पुरुष अनात्मपदार्थों का अभ्यास किया करता है,
उसको तो तत्त्वस्मरण का अवकाश [ मौक़ा=फुर्सत ] ही नहीं
मिलता । इतना ही नहीं प्रत्युत ऐसे अभ्यास ब्रह्माभ्यास के
विघातक होते हैं । उस समय तो स्मरण किया हुआ तत्व भी
बलात् भूल जाता है ।
तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ ।
इति श्रुतं तथान्यत्र वाचो विग्लापनं त्विति ॥१२८॥
तत्त्वस्मरण के विरोधी काव्यतर्कादि के अनुशीलन को
छोड़ने की बात 'तमेवैकं विजानीथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ
अमृतस्यैष सेतुः' (मुण्ड२५-२) इस श्रुति में तथा (नानुध्यायाद्बहूञ्शब्दा
न्वाचो विग्लापनं हि तत्) (बृह० ४-४-२१) इस श्रुति में कही
गयी है ।
आहारादि त्यजन्नैव जीवेच्छास्त्रान्तरं त्यजन् ।
किं न जीवसि, येनैवं करोष्यत्र दुराग्रहम् ॥१२९॥
भोजनादि का त्याग करके तो कोई जीवित नहीं रह
सकता । क्या तुम उसी तरह दूसरे अनात्मशास्त्रों का त्याग
करके जीवित नहीं रह सकते हो ? जिससे ऐसा दुराग्रह किये
जा रहे हो ।
जनकादेः कथं राज्यमिति चेद् दृढबोधतः ।
तथा तवापि चेत् तर्कं पठ यद्वा कृषिं कुरु ॥१३०॥