पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२९
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२९
असाधारण आकार ओषध्यन्नवपुष्यपि ।
एवं विभाव्यं मनसा तत्तद्रूपं यथोचितम् ॥७७॥
ओषधि अन्न तथा शरीरों में भी उन उन का असाधारण
आकार होता ही है । उन उन के उचित रूप को अपने मन से
समझ लेना चाहिये ।
अनेकधा विभिन्नेषु नामरूपेषु चैकधा ।
तिष्ठन्ति सच्चिदानन्दा विसंवादो न कस्यचित् ॥७८॥
सब वस्तुओं में नाम रूप तो भिन्न भिन्न होते ही हैं परन्तु
सच्चिदानन्द नाम के धर्म सब में एक रूप ही होते हैं । इसमें
किसी भी विवेकी को विसंवाद नहीं है ।
निस्तत्वे नामरूपे द्वे जन्मनाशयुते च ते ।
बुद्ध्या ब्रह्मणि वीक्षस्व समुद्रे बुद्बुदादिवत् ॥७९॥
इन दीख पड़ने वाले नामरूपों की गति हमसे पूछो तो हम
कहेंगे कि—ये दोनों नाम रूप तो 'निस्तत्व' किंवा कल्पित ही
हैं । क्योंकि इनके जन्म और नाश [वार बार] होते ही रहते
हैं । समुद्र में जैसे बुलबुलों को देखते हो, इसी प्रकार इन नाम
रूपों को बुद्धि के सहारे ब्रह्मतत्व में ही देखा करो ।
सच्चिदानन्दरूपेऽस्मिन् पूर्णे ब्रह्मणि वीक्षिते ।
स्वयमेवावजानाति नामरूपे शनैः शनैः ॥८०॥
जब कोई अधिकारी इस पूर्ण सचिदानन्द ब्रह्म को बुद्धि
से देख पाता है [ बुद्धि का उड़ान मारकर सब जगह देख
आता है ] तब फिर वह धीरे धीरे नाम रूपों की अवज्ञा करने
लग पड़ता है [ उसे फिर यह सब पसारा नहीं भाता किन्तु उसे
तो कारण तत्व ही प्यारा लगने लगता है ।]
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५३० पञ्चदशी
यावद् यावदवज्ञा स्यात् तावत्तावत् तदीक्षणम् ।
यावद् यावद् वीक्ष्यते तत् तावत्तावदुभे त्यजेत् ॥८१॥
जितनी जितनी [ नाम रूपों की ] अवज्ञा होती जाती है
उतना ही उतना ब्रह्म का दर्शन होने लगता है । और जितना
ही जितना वह ब्रह्म तत्व दीखने लगता है उतना ही उतना वे
दोनों [नामरूप] छूटने लगते हैं [ नाम रूप की अवज्ञा से ब्रह्म
दर्शन बढ़ता है और ब्रह्मदर्शन से नाम रूप में से आस्था हट
जाती है । श्लोक का भाव यह है कि ब्रह्मज्ञान की दृढता के लिये
द्वैत की अवज्ञा करते रहना चाहिये ]
तदभ्यासेन विद्यायां सुस्थितायामयं पुमान् ।
जीवन्नेव भवेन्मुक्तो वपुरस्तु यथा तथा ॥८२ ॥
इन दोनों [ द्वैतावज्ञा और ब्रह्मदर्शन ] अभ्यासों से जब
इस अधिकारी की विद्या स्थिर हो जाती है, तब यह पुरुष जीते
जी ही मुक्त हो जाता है । उसके शरीर इन्द्रिय तथा मन प्रारब्ध
के अनुसार जैसे तैसे रह सकते हैं । [ उनसे (शरीर के भिन्न
भिन्न प्रारब्धों से) उसकी मुक्ति में बाधा नहीं होती ]
तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योऽन्यं तत्प्रबोधनम् ।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः ॥८३॥
उसी का चिन्तन, उसी का कथन, एक दूसरे को उसी को
समझाना और सदा तन्निष्ठ होकर रहना, इसी को ज्ञानी लोग
'ब्रह्माभ्यास' समझते हैं ।
वासनानेककालीना दीर्घकालं निरन्तरम् ।
सादरं चाभ्यस्यमाने सर्वथैव निवर्तते ॥८४॥
अनादि काल से लेकर जो वासनायें हृदय में घुसी बैठी हैं