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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४७१

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४७१

श्मश्रुकण्टकवेधेन बाले रुदति तत्पिता ।
चुम्बत्येव न सा प्रीति र्बालार्थे स्वार्थ एव सा ॥१०॥
[दृष्टान्त में भी देख लो कि—अपनी एकपक्षीय (एकतर्फ़ा)
इच्छा से ही प्रवृत्ति होती है] दाढ़ी मूँछ के काँटे जब चुभते हैं
और बालक रोता है तब भी उसका पिता उस बालक को चूमता
ही जाता है । क्या पिता के इस प्रेम को बच्चे की प्रीति के लिए
ही कहोगे ? पिता का यह प्रेम तो अपनी तुष्टि के लिए ही
होता है ।
निरिच्छमपि रत्नादिवित्तं यत्नेन पालयन् ।
प्रीतिं करोति सा स्वार्थे वित्तार्थत्वं न शङ्कितम् ॥११॥
[जो पति पत्नी तथा पुत्रादि चेतन पदार्थ हैं, उनकी प्रीति
में स्वार्थ परार्थ का सन्देह हो भी जाता हो, परन्तु जो पदार्थ
अचेतन होने के कारण कुछ इच्छा ही नहीं करते, उन पदार्थों
से जब हम प्रीति करते हैं, तब तो परार्थता की शंका ही नहीं
रह जाती] देखो, इच्छा से हीन रत्न आदि धन को यत्न से
पालता हुआ धनी, जब उस वित्त पर प्रेम करता है तब उस
धनी का वह प्रेम स्वार्थमूलक ही होता है । धनी का वह प्रेम
धन के लिए किया हुआ प्रेम है ऐसी शंका कोई नहीं करता ।
अनिच्छति बलीवर्दे विवाहयिषते बलात् ।
प्रीतिः सा वणिगर्थैव बलीवर्दार्थता कुतः ॥१२॥
बैल तो बोझ को ढोना नहीं चाहता, परन्तु व्यौपारी उससे
ज़बरदस्ती बोझ ढुआना चाहता है । बोझ ढोने के लिए रक्खे
हुए उस बैल पर जो वणिक् का प्रेम होता है वह तो वणिक् के
ही लिए होता है । वह प्रेम बैल के लिए कैसे हो जायगा ?

४७२ पञ्चदशी

ब्राह्मण्यं मेऽस्ति पूज्योऽहमिति तुष्यति पूजया ।
अचेतनाया जातेर्नो सन्तुष्टिः पुंस एव सा ॥१३॥
'मैं ब्राह्मण हूँ इसी से मैं पूजनीय हूँ' इस प्रकार ब्राह्मण्य-
निमित्तक पूजा से जो सन्तोष होता है, वह सन्तोष अचेतन
ब्राह्मण जाति को नहीं होता। वह सन्तोष तो [ ब्राह्मणपन के
अभिमानी ] पुरुष को ही होता है।
क्षत्रियोऽहं तेन राज्यं करोमीत्यत्र राजता ।
न जाते, वैश्यजात्यादौ योजनायेदमीरितम् ॥१४॥
'मैं क्षत्रिय हूँ, इसी से मैं राज करता हूँ' इसमें जो राज्य
भोग के कारण सुख होता है, वह क्षत्रियत्व जाति वाले पुरुष
को ही होता है। क्षत्रियत्व जाति को उसका कुछ भी सुख नहीं
होता [क्योंकि जाति तो जडपदार्थ है] वैश्यादि जातियों में भी
इसी प्रकार समझने के लिए उपलक्षण रूप में इनका नाम लिया
है। उनमें भी यही बात समझनी चाहिए।
स्वर्गलोकब्रह्मलोकौ स्तां ममेत्यभिवाञ्छनम् ।
लोकयोर्नोपकाराय, स्वभोगायैव केवलम् ॥१५॥
[कर्म और उपासना से] 'स्वर्ग या ब्रह्मलोकादि मुझे प्राप्त
हो जाय' यह जो वाञ्छा प्राणी को होती है, यह लोकों की
भलाई के लिए नहीं होती। यह तो केवल अपने भोग के लिए
होती है।
ईशविष्ण्वादयो देवाः पूज्यन्ते पापनष्टये ।
न तन्निष्पापदेवार्थं, तत्तु स्वार्थं प्रयुज्यते ॥१६॥
पाप की निवृत्ति के लिए जो ईश या विष्णु आदि देवता