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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१

तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१
'परोक्ष' और 'अपरोक्ष' का विरोधी जोड़ा इसी प्रकार
'ज्ञान' और 'अज्ञान' का विरोधी जोड़ा, यह दोनों ही नित्य
अपरोक्ष आत्मा में भी हो ही सकते हैं। जैसे कि दशवें में ये
दोनों ही [विरोधी बातें] पाये जाते हैं।
नवसंख्याहृतज्ञानो दशमो विभ्रमात्तदा।
न वेत्ति दशमोऽस्मीति वीक्षमाणोऽपि तान्नव ॥२३॥
[दस आदमी किसी नदी को पार उतरे। उतर कर अपने
आदमियों को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़ कर
शेष नौ को गिन लेता था। परिणाम में वे नदी के किनारे बैठ
कर दसवें को रो रहे थे कि हाय ! दसवाँ डूब गया] उस
गिनने वाले दसवें को अपना जो ज्ञान होता था उस ज्ञान को
नौ (९) की गिनती ने दबा दिया था। वह दसवां, पुरुष उन,
नौ को प्रत्यक्ष देखता भी था। परन्तु भ्रान्ति में फंसकर,
गिनने वाला अपने आप को नहीं जानता था कि 'मैं ही तो
दसवां हूँ' [शेष नवों को देखता था, परन्तु अपनी ओर उस
का ध्यान नहीं जाता था। उस का सारा ध्यान नौ ने खेंच
लिया था]।
न भाति नास्ति दशम इति स्वं दशमं तदा।
मत्वा वक्ति तदज्ञानकृतमावरणं विदुः ॥२४॥
तब वह दसवां पुरुष [यद्यपि वह स्वयं ही दशवां है, फिर
भी] अपने ही को कह बैठता है कि—दसवां न तो मुझे प्रतीत
ही होता है और न दसवां है ही। बुद्धिमान लोग इसी को तो
अज्ञान का किया हुआ आवरण [परदा] बताते हैं।

२३२ पञ्चदशी
नद्यां ममार दशम इति शोचन् प्ररोदिति ।
अज्ञानकृतविक्षेपं रोदनादिं विदुर्बुधाः ॥२५॥
अब वह दसवां मनुष्य शोक करता और रोता है कि हाय !
दसवां तो नदी में डूब मरा । बुद्धिमान् लोग इस रोदन आदि
को अज्ञान का किया हुआ विक्षेप समझते हैं ।
न मृतो दशमोऽस्तीति श्रुत्वाप्तवचनं तदा ।
परोक्षत्वेन दशमं वेत्ति स्वर्गादिलोकवत् ॥२६॥
जब कोई आप्त पुरुष आकर कहता है कि—भाई दसवां
मरा नहीं, वह तो यहीं है, तब इस आप्त वचन को सुनकर
परोक्षरूप से दसवें को जान जाता है । जैसे शास्त्र के कहने से
स्वर्गादिलोक को परोक्षरूप से जान लिया जाता है ।
त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शितः ।
अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति ॥२७॥
उस आप्त पुरुष ने, नौ को गिनने के बाद उससे कह दिया
[बता दिया] कि 'दसवां तो तू ही है' बस अब तो उसने अपरोक्ष-
रूप से अपने आपको जान लिया कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ।
अब तो वह परमहृष्ट होता है, अब वह पहले की तरह रोता नहीं है।
अज्ञानावृतिविक्षेपद्विविधज्ञानतृप्तयः ।
शोकापगम इत्येते योजनीयाश्चिदात्मनि ॥२८॥
(१) अज्ञान (२) आवरण (३) विक्षेप (४) परोक्षज्ञान
(५) अपरोक्ष ज्ञान (६) तृप्ति तथा (७) शोकनाश ये सातों
अवस्थायें जो दृष्टान्तभूत दसवें में दिखाई गयी हैं, दार्ष्टान्तिक
चिदात्मा में भी लगा लेनी चाहियें ।