पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४७
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४७
संख्यामेवेष जानाति न तु वेदानशेषतः ।
यदि तर्हि त्वमप्येवं नाशेषं ब्रह्म वेत्सि हि ॥८१॥
यह तो संख्या को ही जानता है, वेदों के स्वरूप को यह
सम्पूर्ण रीति से नहीं जानता है, ऐसा यदि तुम कहो तो हम
कहेंगे कि तुम भी तो ऐसे ही सम्पूर्ण ब्रह्म को नहीं जानते हो ।
अखण्डैकरसानन्दे मायातत्कार्यवर्जिते ।
अशेषत्वसशेषत्ववार्ताविसर एव कः ॥८२॥
[शंका करने वाला कहता है] जो अखण्ड एक रस आनन्द
है, जिसमें माया और उसका कार्य कुछ भी नहीं है, उसमें
सम्पूर्ण और अधूरे की बात को अवसर ही कहाँ है ?
शब्दानेव पठस्याहो तेषामर्थं च पश्यसि ।
शब्दपाठेऽर्थबोधस्ते संपाद्यत्वेन शिष्यते ॥८३॥
[उत्तर] 'अखण्डैकरस' 'अद्वितीय' 'सच्चिदानन्दरूप' इत्यादि
शब्द ही शब्द कहना जानते हो अथवा उनका जो स्वगतादि-
भेदशून्यता रूपी गम्भीर अर्थ है उसको भी पहचानते हो ?
क्योंकि मुख से शब्दों का उच्चारण कर देने पर भी तुम्हें अर्थ
बोध करना शेष रह ही जाता है ।
अर्थे व्याकरणाद् बुद्धे साक्षात्कारोंऽवशिष्यते ।
स्यात् कृतार्थत्वधीर्यावत् तावद् गुरुमुपास्व भोः ॥८४॥
व्याकरणादि से परोक्षज्ञान जब कर लिया जाता है, तब भी
संशयादि को हटा कर प्रत्यक्ष करना शेष रह ही जाता है। जब
तक तुम्हारी बुद्धि तुम्हें अपने कृतार्थ होने का नीरव संदेश न
सुनादे तब तक तुम गुरु की उपासना करते रहो। [जब कृतार्थत्व
बुद्धि उत्पन्न हो जाय तभी ज्ञान की सम्पूर्णता समझ लेना]
१४८ पंचदशी
आस्तमेतद् यत्र यत्र सुखं स्याद् विषयैर्विना ।
तत्र सर्वत्र विद्ध्येतां ब्रह्मानन्दस्य वासनाम् ॥८५॥
इस सब को यहीं छोड़कर अब प्रकृत बात कहते हैं कि—
जहां जहां [ तूष्णींभाव आदि के समय ] विषयानुभव के बिना
भी सुख होता हो वहां सभी जगह इस ब्रह्मानन्द की वासना को
समझ लो ।
विषयेष्वपि लब्धेषु तदिच्छोपरमे सति ।
अन्तर्मुखमनोवृत्तावानन्दः प्रतिबिम्बति ॥८६॥
विषयों के मिल जाने पर भी जब उन विषयों की इच्छा
शान्त हो जाती और मन अन्तर्मुख होता है तब उस अन्तर्मुख
मन में इसी आनन्द का प्रतिबिम्ब पड़ा करता है । [ यही
'विषयानन्द' किंवा दुनियादारी का सुख कहाता है ]
ब्रह्मानन्दो वासना च प्रतिबिम्ब इति त्रयम् ।
अन्तरेण जगत्यस्मिन्नानन्दो नास्ति कश्चन ॥८७॥
'ब्रह्मानन्द' 'वासनानन्द' तथा 'विषयानन्द' इन तीन
आनन्दों के बिना जगत् में कोई आनन्द ही नहीं है ।
'ब्रह्मानन्द' वह है जो सुषुप्ति में स्वप्रकाशरूप से भासा
करता है । 'वासनानन्द' वह है जो कि चुप बैठने पर विषयानु-
भव के बिना ही प्रतीत हुआ करता है। अभिलषित विषय
के मिलने पर जब कि मन अन्तर्मुख हो जाया करता है तब
जो उसमें आत्मानन्द का प्रतिबिम्ब हो जाता है वह तो
'विषयानन्द' कहाता है ।
शंका—इसी प्रकरण के ११ वें श्लोक में “आनन्दस्त्रिविधो 'ब्रह्मा-
नन्दो' 'विद्यासुखं' तथा 'विषयानन्दः” इस प्रकार तीन तरह का आनन्द