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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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१५० पञ्चदशी
चैतन्य तो रहता ही है [ इस कारण उन जड पदार्थों को
भी स्वयं कह देने से कोई विरोध नहीं होता । यों भी स्वयन्ता
और आत्मता एक ही बात हो जाती है । ]
चेतनाचेतनभिदा कूटस्थात्मकृता न हि ।
किन्तु बुद्धिकृताभासकृतैवेत्यवगम्यताम् ॥४५॥
घट आदि जड पदार्थों में भी जब आत्मचैतन्य है तो
फिर चेतन और अचेतन का भेद क्यों है ? इसका उत्तर दिया
जाता है कि—चेतन और अचेतन का भेद बुद्धिकृत आभास
[चिदाभास] के कारण से ही है [ जहाँ चिदाभास होता है
उसे चेतन कहा जाता है । जहाँ चिदाभास नहीं होता उसे
अचेतन कहते हैं । यह चेतन और अचेतन का भेद तो चेतन
के आभास के पड़ने और न पड़ने से हो जाता है । यह भेद
कूटस्थ आत्मा का किया हुआ नहीं है ]
यथा चेतन आभासः कूटस्थे भ्रान्तिकल्पितः ।
अचेतनो घटादिश्च तथा तत्रैव कल्पितः ॥४६॥
जैसे चेतन आभास कूटस्थ में भ्रान्ति से कल्पित है,
ठीक इसी तरह अचेतन घटादि भी उसी कूटस्थ में भ्रान्ति
से कल्पित है ।
भाव यह है कि यह तो ठीक है कि चेतन और अचेतन के
विभाग का कारण कूटस्थ तत्व नहीं है, परन्तु अचेतन पदार्थों
की कल्पना का अधिष्ठान तो वह ठीक वैसे ही है जैसे कि यह
चिदाभास की कल्पना का अधिष्ठान है । इस कारण से अचे-
तनों में भी आत्मा की सत्ता को मानना पड़ता है ।