पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् १३१
चित्रदीपप्रकरणम् १३१
निरूपण करना छोड़कर जलाकाश का निरूपण इस श्लोक में किया
जाता है ] घट के अन्दर के आकाश में जो जल भरा है, उस
जल में जो मेघ और नक्षत्र सहित आकाश प्रतिबिम्बित हो
रहा है, उसी को यहाँ 'जलाकाश' कहा जाता है ।
महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते ।
प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥
इस महाकाश में जो मेघमण्डल दीखता है [ उस मेघ-
मण्डल में जो जल रहता है ] उस जल में प्रतिबिम्बित जो
आकाश है वही 'मेघाकाश' कहाता है ।
मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् ।
तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादुन्मीयते ॥२१॥
मेघ का अंश रूपी जो जल होता है वह तुपार के [ बहुत
छोटे से ] आकार में रहता है । जल होने के कारण यह अनु-
मान कर लिया जाता है कि उसमें भी आकाश का प्रतिबिम्ब
होगा ही ।
अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः ।
कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥२२॥
[ स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही प्रकार के देह अविद्याकल्पित
हैं, उन ] दोनों देहों का अधिष्ठान होने से जो चेतन दोनों देहों
से अवच्छिन्न (घिरा.हुआ) हो रहा है, उसी चेतन को 'कूटस्थ'
कहते हैं। क्योंकि वह लुहारे के कूट [ ऐरन= जिस लोहे पर
रखकर दूसरे लोहे ठोके पीटे जाते हैं, परन्तु जो स्वयं सदा
एक सा बना रहता है ] के समान निर्विकार रहता है इससे
उसे 'कूटस्थ' कहा जाता है ।
१३२ पञ्चदशी
कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः ।
प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते ॥२३॥
बुद्धि उस कूटस्थ में कल्पित है । उस बुद्धि में चेतन का
जो प्रतिबिम्ब है, वह जब प्राणों को धारण कर लेता है तब
उसको 'जीव' कहने लगते हैं । यह जीव ही संसार में फँसा
करता है । [ कूटस्थ आत्मा संसार से युक्त कभी नहीं होता ]
जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः ।
तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योऽन्याध्यास उच्यते ॥२४॥
जैसे जलाकाश सम्पूर्ण घटाकाश को ढक देता है [उसे
दीखने नहीं देता ] इसी प्रकार इस जीव ने कूटस्थ आत्मा को
तिरोहित कर डाला है [ उसे प्रकट नहीं रहने दिया है ] इसी
तिरोधान को [ भाष्यादि में ] 'अन्योन्याध्यास' कहा गया है ।
अयं जीवो न कूटस्थं विविनक्ति कदाचन ।
अनादिरविवेकोऽयं मूलाविद्येति गम्यताम् ॥२५॥
यह जीव कभी भी उस कूटस्थ तत्व को पृथक् नहीं पहचा-
नता है । अनादि काल से चली आने वाली उसकी यह जीव
और कूटस्थ की भेदा प्रतीति ही 'मूलाविद्या' कहाती है [इस
अविद्या से ही अन्योन्याध्यास की उत्पत्ति हुआ करती है ]
विक्षेपावृतिरूपाभ्यां द्विधाऽविद्या व्यवस्थिता ।
न भाति नास्ति कूटस्थ इत्यापादनमावृतिः ॥२६॥
'विक्षेप' और 'आवृति' इन दो भेदों से अविद्या दो प्रकार
की होती है । 'कूटस्थ नाम की चीज़ न तो प्रतीत ही होती
है और न वह है ही' ऐसा मिथ्या व्यवहार करानेवाला 'आव-
रण' कहाता है ।