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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 157

चित्रदीपप्रकरणम् १३९
कहा जाय तो कूटस्थ को आत्मा बतानेवाले मेरे मत में यह
अन्यत्व का वारण तो इष्ट ही होता है ।
शंका यह हैकि स्वत्वरूपी धर्म,अन्यता का वारण करता
है अर्थात् जो 'स्व' है वह अन्य नहीं हो सकता, परन्तु वह
कूटस्थता का बोध तो नहीं कराता । इसका समाधान यह है
कि स्वयं शब्द का अर्थ जो कूटस्थ तत्व है वही तो आत्मा है
इस कारण स्वत्व से यदि अन्य का वारण होता है तो यह इष्ट
ही है । [जो अनात्मा है उसका वारण कर देने से आत्मा तो
स्वयं ही शेष रह जाता है फिर उसके लिये कुछ भी करना नहीं
पड़ता । यों जब यह स्वयं शब्द अन्यों को हटा देता है तब
अर्थात् ही इससे कूटस्थ का बोध हो जाता है । ]
स्वयमात्मेति पर्यायौ, तेन लोके तयोः सह ।
प्रयोगो नास्त्यतः स्वत्वमात्मत्वं चान्यवारकम् ॥४३॥
स्वयम् और आत्मा इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है ।
यही कारण है कि लोक में इन दोनों शब्दों का एक साथ
प्रयोग नहीं होता । निचोड़ तो यही है कि स्वत्व और आत्मत्व
दोनों ही अन्य के वारक हैं । यों स्वयं शब्द का अर्थ कूटस्थ
आत्मा ही है, क्योंकि ये दोनों पर्यायवाचक हैं ।
घटः स्वयं न जानातीत्येवं स्वत्वं घटादिषु ।
अचेतनेषु दृष्टं चेद् दृश्यतामात्मसत्त्वतः ॥४४॥
यदि कहो कि 'घट स्वयं नहीं जानता' इस वाक्य में
अचेतन घटादि पदार्थों में भी स्वत्व देखा जाता है फिर स्वत्व
और आत्मत्व भिन्न भिन्न क्यों नहीं है ? तो इसका समाधान
यह है कि—घटादि जड पदार्थों में भी स्फुरण रूप से आत्म