पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७
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पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७
स्वयमेवानुभूतित्वाद् विद्यते नानुभाव्यता ।
ज्ञातृज्ञानान्तराभावादज्ञेयो न त्वसत्तया ॥१३॥
स्वयं अनुभूतिरूप होने से वह तत्त्व किसी का अनुभाव्य
नहीं होता है । उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान
दूसरा न होने से वह अज्ञेय रहता है। उस के अज्ञेय होने का
कारण असत्ता नहीं होती ।
इन आनन्दमयादियों का जो साक्षी है वह क्योंकि अनु-
भव रूप है इसी से वह अनुभाव्य कभी नहीं होता है । उस
के 'अज्ञेय' होने का कारण उसकी असत्ता नहीं है । किन्तु
उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान कोई होता ही नहीं
है इस कारण से वह अज्ञेय बना हुआ है। ऐसी अवस्था में
केवल अनुपलब्ध होने से ही उसे असत् नहीं मान बैठना
चाहिये । उपलब्ध तो विषय हुआ करते हैं । वह किसी का
विषय नहीं है । इसी से वह किसी को उपलब्ध नहीं होता
है । वह तो उपलब्ध करने वालों का स्वयं आत्मा [आपा] ही
होता है ।
माधुर्यादिखभावानामन्यत्र स्वगुणार्पिणाम् ।
स्वस्मिंस्तदर्पणापेक्षा नो, न चास्त्यन्यदर्पकम् ॥१४॥
माधुर्य आदि स्वभाव वाले [गुडादि पदार्थ] जौ चने आदि
में, अपने माधुर्य आदि गुणों को डाल देते हैं, वे अपने आप
में तो उन मधुरता आदि की ज़रूरत ही नहीं रखते [वे गुडादि
यह कभी नहीं चाहते कि कोई हमको आकर मीठा कर दे ]
इसके अतिरिक्त गुडादि में मधुरता को उत्पन्न करने वाली
कोई वस्तु भी तो नहीं है ।
७८ पंचदशी
अर्पकान्तरराहित्येऽप्यस्त्येषां तत्स्वभावता ।
माभूत्तथाऽनुभाव्यत्वं बोधात्मा तु न हीयते ॥१५॥
उनमें माधुर्यादि पैदा करने वाले किसी दूसरे पदार्थ के
न होने पर भी इन गुडादियों में माधुर्यादिस्वभावता है ही ।
इसी प्रकार आत्मा भले ही [किसी के] अनुभव का विषय न
होता हो, परन्तु उसकी अनुभवरूपता तो रहती ही है । उसे
कौन हटा सकता है ?
स्वयंज्योतिर्भवत्येष पुरोऽस्माद् भासतेऽखिलात् ।
तमेव भान्तमन्वेति तद्भासा भास्यते जगत् ॥१६॥
“अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति, अस्मादखिलात्पुरतः भासते,
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति”'काठ २-३-१५)
इत्यादि श्रुतियें आत्मा को स्वप्रकाश बता रही हैं ।
येनेदं जानते सर्वं तत् केनान्येन जानताम् ।
विज्ञातारं केन विन्द्याच्छक्तं वेद्ये तु साधनम् ॥१७॥
जिस से इस सब [पसारे] को जान रहे हैं, उस [ज्ञाता]
को दूसरे किस से जानें ? जानने वालों को किस से पहचानें ?
क्योंकि जानने के साधन भी तो वेद्य पदार्थ को ही जानने में शक्त हैं।
जिस साक्षिचैतन्य रूप आत्मा से, प्राणी इस समस्त दृश्य
जगत् को जानते हैं, उस साक्षी आत्मा को किस साक्ष्य जड
पदार्थ से जानें ? तात्पर्य यह है कि—इस दृश्य जगत् के
ज्ञाता को किस दृश्य से जाना जाय ? अर्थात् वह किसी से
भी नहीं जाना जा सकता । ज्ञान का साधन यह बिचारा मन
भी तो वेद्य पदार्थ में ही समर्थ है । ज्ञाता आत्मा में तो उस से
भी कुछ नहीं होता । देखो बृहदारण्यक ४–५–१५ ।