पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१५
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नहीं है)। [इन घटादि कार्यों का आधार बनी हुई] स्पर्श आदि
गुणवाली केवल मिट्टी ही सत्य पदार्थ है।
व्यक्ताव्यक्ते तदाधार इति त्रिष्वाद्ययोर्द्वयोः।
पर्यायः कालभेदेन, तृतीयस्त्वनुगच्छति ॥४०॥
'व्यक्त', 'अव्यक्त' तथा 'इन दोनों का आधार' ये तीन ही
पदार्थ हैं। [घट आदि कार्य व्यक्त कहाते हैं। इन कार्यों की
कारण शक्ति अव्यक्त कही जाती है। कार्य और शक्ति इन दोनों
का 'आधार' मिट्टी होती है]। इन तीनों में पहले दोनों [कार्य
तथा शक्ति] का कालभेद से पर्याय [क्रम] रहता है। [कभी
कार्य होता है और कभी शक्ति रहती है। शक्ति और कार्य ये
दोनों ही कादाचित्क हैं। इसी से ये मिथ्या या अनृत कहे जाते
हैं]। किन्तु इन दोनों का आधार तीसरा पदार्थ जो मिट्टी आदि
है वह तो दोनों में ही अनुगत रहता है [वह मिट्टी कार्यावस्था
में भी रहती है और शक्ति काल में भी बनी रहती है। यों
त्रिकालस्थायी होने से वही सत्य तत्व है]।
निस्तत्त्वं भासमानं च व्यक्तमुत्पत्तिनाशभाक्।
तदुक्तौ तस्य नाम वाचा निष्पाद्यते नृभिः ॥४१॥
व्यक्त कहाने वाले घटादि पदार्थ यद्यपि निस्तत्व [अर्थात्
स्वरूप से असत्] हैं तो भी भासा करते हैं। इनके उत्पत्ति
और विनाश भी रहते हैं। जब ये उत्पन्न हो जाते हैं तब मनुष्य
शब्दों में इनका नाम रख लेते हैं। [इन्हीं सब कारणों से इन
विकारों (कार्यों) को 'असत्य' कहा जाता है।]
व्यक्ते नष्टेऽपि नामैतन्नृवक्त्रेष्वनुवर्तते।
तेन नाम्ना निरूप्यत्वाद् व्यक्तं तद्रूपमुच्यते ॥४२॥
व्यक्त [ कार्य ] पदार्थ जब नष्ट भी हो जाते हैं तब भी
[उन कार्यों से अभिन्न] यह नाम, नाम लेने वाले आदमियों की
जिह्वा पर चढ़ा रह जाता है। अब तो वह व्यक्त [ कार्य ] पदार्थ
वाणी से लिये जाने वाले केवल उस नाम से ही निरूपणीय
[ व्यवह्रियमाण ] रह जाता है [ उसके व्यवहार का अब कोई
साधन नहीं रह जाता ] इस कारण वह तद्रूप [अर्थात्
नाम के ही रूप वाला किंवा नामात्मक ] कहलाने लगता है ।
भाव यह है कि—विवादास्पद जो घट है वह घटशब्द-
रूप ही होना चाहिये, क्योंकि उसका व्यवहार ठीक इसी प्रकार
घटशब्द से होता है जिस प्रकार घट इस शब्द का व्यवहार
घट शब्द से होता है। यों व्यक्त पदार्थ नामात्मक होते हैं।
निस्तत्त्वाद् विनाशित्वाद् वाचारम्भणनामतः ।
व्यक्तस्य न तु तद् रूपं सत्यं किञ्चिन्मृदादिवत् ॥४३॥
व्यक्त घटादि कार्यों का मोटा गोल आदि जो रूप [ या
आकार ] हमें दीखता है वह कुछ भी, जैसे मिट्टी सत्य है, वैसे
सत्य नहीं हैं। क्योंकि वह आकार तो निस्तत्त्व है [उसका वास्तव
रूप तो कुछ भी नहीं है ] विनाशी है [ मिट्टी के रहते रहते ही
वह तो नष्ट हो जाता है ] तथा वाणी से कहा हुआ एक शब्द
मात्र ही तो है। यदि यह आकार असत्य न होता तो जैसे मिट्टी
आदि निस्तत्त्व नहीं है, विनाशी नहीं है या केवल नाम मात्र ही
नहीं हैं ऐसे ही यह भी होते ।
व्यक्तकाले ततः पूर्वमूर्ध्वमप्येकरूपभाक् ।
सतत्त्वमविनाशं च सत्यं मृद्वस्तु कथ्यते ॥४४॥
व्यक्त पदार्थ की स्थिति के समय, व्यक्त पदार्थ की उत्पत्ति