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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 172

१५४ पञ्चदशी
निष्कलं निष्क्रियम् [ श्वेता० ६-१९ ] इत्यादि श्रुतियें आत्मा को
आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक तथा निरवयव मानती हैं ।
इत्युक्त्वा तद्विशेषे तु बहुधा कलहं ययुः ।
अचिद्रूपोऽथ चिद्रूपश्चिदचिद्रूप इत्यपि ॥८७॥
यों आत्मा की विभुता तो सिद्ध हो गयी । परन्तु
उसके विशेष धर्मों के विषय में भी अनेक विवाद चलते हैं ।
कोई कहता है आत्मा 'अचिद्रूप' है। दूसरा आत्मा को 'चिद्रूप'
मानता है । कोई उसे चिदचिद्रूप भी बता देता है ।
प्राभाकरास्तार्किकाश्च प्राहुरस्याचिदात्मताम् ।
आकाशवद् द्रव्यमात्मा शब्दवत् तद्गुणश्चितिः ॥८८॥
प्राभाकर और तार्किक दोनों ही इसको अचिद्रूप बताते
हैं। वे कहते हैं कि—आत्मा भी आकाश की तरह एक द्रव्य है।
शब्द जैसे आकाश का गुण है इसी प्रकार चिति [ चैतन्य ]
उस. आत्मा का गुण है। [ इस चैतन्य गुण ने ही इस आत्मा
को पृथिवी आदि सब से भिन्न कर दिया है ] ।
इच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च धर्माधर्मौ सुखासुखे ।
तत्संस्काराश्च तस्यैते गुणाश्चितिवदीरिताः ॥८९॥
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्माधर्म, सुख, दुःख, तथा उनके
संस्कार ये सब चेतना के समान ही आत्मा के गुण हैं ।
आत्मनो मनसा योगे स्वादृष्टवशतो गुणाः ।
जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते सुषुप्तेऽदृष्टसंक्षयात् ॥९०॥
आत्मा का जब मन से योग हो जाता है, तब अपने अदृष्ट
के प्रताप से ये गुण उत्पन्न हो जाते हैं, तथा सुषुप्ति के समय
जब अदृष्ट का क्षय हो जाता है तब ये गुण नष्ट हो जाते हैं ।