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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

4. Dvaita Viveka

[ ४ ]
द्वैतविवेक का संक्षेप
द्वैतविवेक नाम के चौथे प्रकरण में बताया गया है कि—द्वैत
दो तरह का होता है । एक ईश्वर का द्वैत, दूसरा जीव का द्वैत ।
इन्द्रियों से दीख पड़ने वाला संसार ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत
है । इस द्वैत के विषय में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार जीवों
के जो भिन्न भिन्न प्रकार के मनोविचार बनते हैं वही तो जीव का
बनाया हुआ द्वैत कहाता है । ईश्वर जिन पदार्थों को बनाता है
वह तो उनका स्वरूप ही बनाता है । ईश्वर के बना देने से ही
वे हमारे ( जीवों के ) काम के नहीं हो जाते हैं । वे तो हमारे
काम के तभी होते हैं जब हमें उनके विषय में कुछ ज्ञान हो
जाय, जब हम उनका ध्यान करने लग पड़ें, जब हम उन्हें
सुखदायी या दुःखदायी मान बैठें तथा उनको पाने या छोड़ने
का कर्म ( उद्योग ) करने लगें । यही कारण है कि ईश्वर की
सृष्टि के अनन्त पदार्थों में से केवल वे ही थोड़े से पदार्थ हमारे
भोग में आते हैं जिनका हम ध्यान किया करते हैं जो हमारे मन
में बस जाते हैं, या जिनके पाने या छोड़ने का उद्योग हम किया
करते हैं । यों इस जगत् को ईश्वर बनाता है और अपने ज्ञान
तथा कर्म के द्वारा जीव इसको भोगता है । जब ईश्वर मायावृत्ति
नाम का संकल्प करता है तब इस जगत् की उत्पत्ति हो जाती है ।
अत्यन्त बहिर्मुख होने के कारण हम लोगों का संकल्पबल तो नष्ट
प्राय हो गया है । कछवी अपने बच्चों को केवल संकल्प के
बल से पालती है । जो काम दूसरे प्राणी अपने बच्चों को दूध

[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३

[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३
पिलाकर निकालते हैं वही काम कछवी अपने संकल्प से कर
डालती है। संयम करते करते संयमी लोगों के संकल्प में फिर कर्म
की शक्ति आ जाती है। संकल्प में से ही तो कर्म में बल आता है।
तत्त्वज्ञानी के कर्म में और संकल्प में दोनों जगह बल रहता है।
ईश्वर को कर्म करना ही नहीं पड़ता। उसको केवल संकल्प
करना पड़ता है। बस कर्म अपने आप हो जाता है। यों वे
संकल्प से सृष्टि बना लेते हैं। जब जीवात्मा इस ईश्वरोत्पादित
जगत् के विषय में अपने मनोवृत्ति नाम के संकल्प दौड़ाता है,
तब यह जगत् उसके भोग का साधन बनता है, नहीं तो नहीं
बनता। ईश्वर तो मणि को एक ही तरह का बनाते हैं, परन्तु
जिसको वह मिलती है, वह हर्ष करता है। जिसे नहीं मिलती,
वह पछताता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें न पाने का हर्ष
होता है और न उन्हें न मिलने का पछतावा ही होता है। यों
एक मणि में तीन आकार सिद्ध होते हैं —एक 'प्रिय' दूसरा
'अप्रिय' तीसरा 'उपेक्ष्य'। ये तीनों ही आकार जीवों की भिन्न-
भिन्न बुद्धियों के अनुसार ही होते हैं। इन आकारों के बनाने में
ईश्वर का हाथ सर्वथा नहीं होता। देखते हैं कि सम्बन्धियों
के भेद से एक ही स्त्रीपिण्ड दादी, माता, पत्नी, पुत्री, पौत्री
आदि अनेक रूपों में देखी जाती है। वह जो ईश्वरनिर्मित
मांसमय स्त्रीपिण्ड है, वह तो अवश्य ही एक तरह का रहता है,
परन्तु मनोमयी स्त्रियां एक में ही अनेक हो जाती हैं। क्योंकि
भोक्ताओं के मन भिन्न-भिन्न होते हैं। श्रम के समय में, मनोराज्य
के समय में और स्मृति के समय म तो मनोमय पदार्थों से ही
हमारा व्यवहार होता है। इन अवस्थाओं में ईश्वर का बनाया
पदार्थ होता ही नहीं। जाग्रत् काल में भी मनोमय पदार्थों से ही

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व्यवहार होते हैं। परन्तु जाग्रत् समय के मनोमय पदार्थों को
अत्यन्त सावधानी से जान लेना चाहिये। जब हमारा मन किसी
पदार्थ को देखता है, तब वह उसी पदार्थ के रूप का हो जाता
है। आंख बन्द करके ध्यान करते ही वही रूप हमारे मन में
दीखा करता है। यों जब हम जागरण के समय किसी पदार्थ को
देखते हैं तब वहां दोहरे पदार्थ होते हैं—जैसे एक मिट्टी का घड़ा
दूसरा मन का घड़ा। मिट्टी के घड़े को तो हम प्रमाणों से जानते
हैं। परन्तु हमारा मनोमय घड़ा प्रमाणों से नहीं दीखता। वह
तो साक्षी आत्मा से प्रकाशित हुआ करता है। हमको जो वस्तु
बन्धन में डालती है वह यह 'मनोमय' ही तो है। यह हो तो
सुख दुःख होते हैं, नहीं तो नहीं होते। बाह्य पदार्थ नहीं भी
होते, तब भी सुपने आदि में मनोमय पदार्थों से जीव को सुख
दुःख हो जाते हैं। सुपने की मनोमयी स्त्री के संग से वीर्यपात
हो जाता है। समाधि, सुषुप्ति या मूर्छाकाल में बाह्यपदार्थ बने भी
रहते हैं, परन्तु तब मनोमय पदार्थ न होने से जीवों को सुख दुःख
नहीं होते। पुत्र दूरदेश में गया हो और वह जीता हो तब उस
का पिता वंचक के कहने से उसे मरा समझ कर रो देता है।
क्योंकि उसका मनोमय पदार्थ मर गया है। पुत्र मर भी गया हो
परन्तु उसका समाचार न मिला हो तब नहीं रोता। क्योंकि
उसका मनोमय पदार्थ तो जीवित ही है। यों यह स्पष्ट है कि
मानस जगत् ही बन्धन करने वाला है। इस मानस द्वैत को
नष्ट करने के दो उपाय हैं एक 'योग' दूसरा 'ज्ञान'। योग में
मनोनिरोध करना पड़ता है, उससे मानस संसार बनना रुक तो
जाता है, परन्तु वह बीजरूप में तो रहता ही है। जब भी मनो-
निरोध करना छोड़ेंगे, तुरन्त मानस द्वैत आ खड़ा होगा और वह

द्वैतविवेक का संक्षेप २५

द्वैतविवेक का संक्षेप २५

बन्धन करेगा ही। मानसद्वैत को सदा के लिये नष्ट कर देनेवाला
उपाय, ब्रह्मतत्व का—अपने व्यापक आत्मतत्व का—ज्ञान ही है।
ईश्वर का द्वैत आंखों के सामने खड़ा भी रहे परन्तु उसको मिथ्या
( बाधित होजाने वाला ) समझ लेने से ही, पारमार्थिक अद्वैत का
ज्ञान हो सकता है। जब पारमार्थिक अद्वैत का ज्ञान हो जाता
है तब मानससंसार का बनना सदा के लिये रुक जाता है।
जब प्रलय हो जाती है—जब अद्वैत ज्ञान करानेवाले गुरु
या शास्त्र नहीं रह जाते और जब कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करने
वाला द्वैत नहीं रहता है—तब तो अद्वितीय तत्व समझ में आ
ही नहीं सकता। अद्वैत तत्व तो तभी समझ में आता है जबकि
इसका विरोधी द्वैत सामने दिखाई देता हो। यदि द्वैत दिखाई
न देता हो तो अद्वैत जैसे गहन तत्व को जानने का कोई साधन
ही हमारे पास नहीं रह जाता। यों ईश्वर का निर्मित द्वैत अद्वैत-
ज्ञान का बाधक ही नहीं है प्रत्युत साधक भी है। सत्य संकल्प
उस ईश्वर के बनाये हुए उसको हटा देना हम अल्पशक्ति जीवों के
वस का काम भी तो नहीं है। कोई कोई साधक यह मनाया
करते हैं कि स्त्री बच्चे मर जांय तो मैं छूट जाऊँ। उनको यह सम-
झना चाहिये कि ईश्वर के संकल्प से उत्पन्न हुए स्त्री बच्चे तभी
मरेंगे जब ईश्वर का संकल्प पूरा हो जायगा। इन निष्फल संकल्पों
से क्या होना है ? करने की बात तो केवल इतनी ही है कि
तुम उनको अपना मानना छोड़ दो। हमारा इनसे जो मानस
सम्बंध है उसी से तो.हम बँध रहे हैं। उसे न हटाकर, ईश्वर
की चीज़ को बिगाड़ने की इच्छा तो उपहासास्पद इच्छा ही है।
हमको तो इस ईश्वर के द्वैत के रहते रहते ही अपना अद्वैत मार्ग
साफ़ कर लेना.है। इससे द्वेष करना ठीक नहीं है। जैसे मानस

२६ पंचदशी
द्वैत से राग करना बन्धनकारक है वैसे ही ईश्वर के द्वैत से द्वेष
करना भी बन्धनकारक ही है। जीव के द्वैत के दो भेद हैं—एक
शास्त्रीय दूसरा अशास्त्रीय। आत्मा और ब्रह्म का विचार शास्त्रीय
मानस जगत् है। इस द्वैत को तत्वज्ञान हो चुकने के बाद
छोड़ देना चाहिए। अशास्त्रीय द्वैत के दो भेद हैं—एक काम
क्रोध आदि, दूसरा मनोराज्य। ये रहेंगे तो तत्वज्ञान होगा नहीं।
किसी तरह तात्कालिक उपाय कर देने से यदि ज्ञान हो भी
जायगा तो वह ठहरेगा नहीं। तत्वज्ञान के बाद जीवन्मुक्ति की
अवस्था आनी ही चाहिये। उसमें गीता वाली दैवी संपत्ति आनी
ही चाहिए। जो पुरुष काम क्रोधादि के झंझटों में उलझा पड़ा
है, उसका ज्ञान 'ज्ञान' नहीं है। वह मुक्ति रूप फल को देनेवाला
नहीं है। वह तो कोरा ( बन्ध्य ) ज्ञान है। ज्ञान हो जाय
और काम क्रोध आदि न छोड़े जांय, व्यवहार में शुद्धि न आजाय,
ज्ञानी का व्यवहार यह न कहने लग पड़े कि इसके व्यवहार
में देहात्मवाद काम नहीं कर रहा है, तो वह ज्ञान ऐसा ही निर-
र्थक है जैसे कि औषध सेवन करके पथ्यसेवन न किया जाय।
जिसके मन से विषयसुख की लालसा नहीं मिटी है उसको
हज़ार ज्ञान होजाय तौ भी उसकी जन्मपरम्परा टूटनेवाली नहीं
है। जो ज्ञानी होकर भी कामादि को नहीं छोड़ता है उसका
बहुत बड़ा पतन होता है। कारण यह है कि अज्ञानी लोग
जिस ईश्वर तत्व से डरकर या कर्मगति से भय मानकर पाप-कर्म
से बचते हैं वह भय तो इसके मन से जाता रहता है। ऐसा
ज्ञानी अवश्य ही पतित हो जाता है। ज्ञान होने से पहले मनो-
दोष अज्ञानी को सताते हैं, अब ऐसे कोरे ज्ञानी की लोक में
निन्दा भी होने लगती है। यों इस शुष्क ज्ञान से तो वह अज्ञान

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ही अच्छा था। तत्त्वज्ञान का इतना तो दृष्टफल होना ही
चाहिये कि तत्त्वज्ञानी का व्यवहार उसका रहन सहन, उसकी
बात-चीत, सब में अलौकिकपना हो और उसके व्यवहार से
उसकी पूजा हो, लोग उसको श्रद्धा से देखें। कामादि के साथ
ही साथ, सब दोषों के मूल मनोराज्य को भी, बन्द कर देना
चाहिये। मनोराज्य को जीतने के लिये निर्विकल्प समाधि करनी
चाहिये। सविकल्प समाधि करने से निर्विकल्प समाधि होने
लगती है। जिसको तत्व का ज्ञान हो जाय, जो एकान्त वास
करता हो अर्थात् हृदय में बहुतायत से रहने लग पड़ा हो,
जिसके बुद्धि दोष नष्ट हो गये हों वह, लम्बे प्रणवों को बोलकर
मनोराज्य को जीत सकता है।
जब मनोराज्य पर विजय मिल जाती है तब साधक के वृत्ति-
शून्य मनकी हालत गूँगे पुरुष की-सी हो जाती है। गूँगा जैसे
कुछ भी नहीं बोलता इसी प्रकार उसके गूँगे मन में वृत्तियों का
उत्पन्न होना रुक जाता है। 'दृश्य नहीं है' इस ज्ञानरूपी झाडू
को पकड़ कर, मनरूपी मन्दिर में से, दृश्यरूपी कूड़े को निकाल
कर, फेंक दिया जाय तो निरतिशय मोक्ष सुख अन्दर से उमड़
ही पड़ता है। कामादि अवस्थाओं के नष्ट हो जाने पर, जब
वासनाओं से शून्य गम्भीर मौनावस्था का प्रादुर्भाव हो जाता
है, तब इस दशा से उत्तम दशा और कोई भी नहीं है। ऐसा
परमपद जिन लोगों ने पा लिया हो, उनको भी कभी-कभी भोग-
दायी कर्मों के प्रभाव से विक्षेप हो ही जाता है। परन्तु उनके
अभ्यास की प्रबलता उस विक्षेप को ठहरने ही नहीं देती।
उनकी बुद्धि फिर तुरन्त ही समाहित हो जाती है। हाँ जिन
महापुरुषों को विक्षेप होना सर्वथा बन्द हो गया हो, उनको तो

२८ पंचदशी
ब्रह्मज्ञानी कहना भी ठीक नहीं है । अध्यात्मविद्या के पारंगत मुनि
लोगों का कहना है कि वे तो साक्षात् ब्रह्मतत्व ही—सर्वव्यापक
आत्मतत्व ही—हो चुके हैं । जीव के बनाये हुए द्वैत को जब
कोई प्राणी सम्पूर्ण रूप से छोड़ चुकेगा, तभी उसे जीवन्मुक्ति
की ऊँची से ऊँची हालत प्राप्त हो सकेगी, इसी विचार को लेकर
हमने ईश्वर के बनाये हुए द्वैत से, जीव के बनाये हुए द्वैत
को, मुमुक्षु लोगों के सुभीते के लिये, छांट कर रख दिया है ।