पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०३
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०३
खाकर मर जाता है] अन्त में भी आनन्द में ही लीन हो जाता
है । जब श्रुति स्वयं यह बात कह रही है तो यह जगत् अपने
कारण उक्त आनन्द से पृथक् कैसे है ? तुम्हीं बताओ ।
कुलालाद् घट उत्पन्नो भिन्नश्चेति न शङ्क्यताम् ।
मृद्वदेव उपादानं, निमित्तं न कुलालवत् ॥४॥
कुम्हार से घट उत्पन्न हुआ है और वह उससे भिन्न भी
है, ऐसी शंका न करो। क्योंकि यह आत्मानन्द तो, मिट्टी जैसे
घड़े का उपादान कारण होती है इसी प्रकार, इस जगत् का
उपादान कारण है । यह कुम्हार की तरह का केवल निमित्त
कारण नहीं है । [ यह तो जाले का मकड़ी की तरह निमित्त
भी है और उपादान भी है । ]
स्थितिर्लयश्च कुम्भस्य कुलाले स्तो न हि क्वचित् ।
दृष्टौ तौ मृदि, तद्वत् स्यादुपादानं तयोः श्रुतेः ॥५॥
कुम्भ की स्थिति और कुम्भ का लय, कुम्हार में कभी नहीं
होते [इस कारण कुम्हार उसका उपादान नहीं होता] घड़े की
स्थिति और घड़े का लय उसके उपादान मिट्टी में ही होते हुए
प्रत्यक्ष देखे गये हैं। ठीक उसी तरह जगत् का उपादान आनन्द
ही है । श्रुति ने स्वयं अपने मुख से जगत् की स्थिति और
जगत् के लय को आनन्द में होता हुआ माना है ।
उपादानं त्रिधा भिन्नं विवर्ति, परिणामि च ।
आरम्भकं च, तत्रान्त्यौ न निरंशेऽवकाशिनी ॥६॥
उपादान तीन प्रकार का होता है—एक 'विवर्ती' दूसरा
'परिणामी' तीसरा 'आरम्भक' । इनमें से 'आरम्भ' और
'परिणाम' ये दोनों ही पक्ष निरवयव वस्तु में लागू नहीं हो सकते ।
५०४ पञ्चदशी
आरम्भवादिनोऽन्यस्मादन्यस्योत्पत्तिमूचिरे ।
तन्तोः पटस्य निष्पत्तेर्भिन्नौ तन्तुपटौ खलु ॥७॥
आरम्भवादी [वैशेषिक नैयायिक आदि] कहते हैं कि अन्य
[कार्य से सर्वथा भिन्न रहने वाले कारण] से अन्य अर्थात्
कार्य नाम की वस्तु उत्पन्न हुआ करती है [जो कि उससे सर्वथा
भिन्न ही होती है] वे कहते हैं कि तन्तु से वस्त्र की उत्पत्ति
देखी जाती है। इस कारण वे तन्तु और वस्त्र परस्पर भिन्न
ही है। [क्योंकि पट से निकलने वाले काम तन्तुओं से नहीं
निकाल सकते ।]
अवस्थान्तरतापत्ति रेकस्य परिणामिता ।
स्यात् क्षीरं दधि,मृत् कुम्भः,सुवर्णं कुण्डलं यथा ॥८॥
एक ही वस्तु जब पहली अवस्था को छोड़ कर दूसरी
अवस्था में आ जाती है तब उसी को 'परिणाम' कहते हैं। जैसे
कि परिणाम होने पर दूध दही हो जाता हैं, मिट्टी घड़ा बन
जाती है, सोने की बाली हो जाती है ।
अवस्थान्तरभानं तु विवर्तो रज्जुसर्पवत् ।
निरंशेऽप्यस्त्यसौ, व्योम्नि तलमालिन्यकल्पनात् ॥९॥
अपनी पूर्वावस्था भी न छूटे और दूसरी अवस्था का भान
भी होने लग पड़े तो इसे 'विवर्त' कहते हैं। रज्जुसर्प इसका
उदाहरण है [रज्जुरूप से विद्यमान जो पदार्थ है वही सर्वरूप
से भी भासने लगता है। यद्यपि हमने सावयव पदार्थ का ही
दृष्टान्त दिया है परन्तु] यह विवर्त निरवयव पदार्थों में भी
देखा जाता है। देखते हैं कि आकाश यद्यपि निरवयव है तो
भी वह तल सा दीखा करता और उसमें भी नीलवर्णता की